समाधिस्थ कौन? -श्री सूरज द्वारा दिव्य प्रवचन।
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समाधिस्थ कौन? -श्री सूरज द्वारा दिव्य प्रवचन।
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श्री सूरज कहते हैं कि मुक्त पुरुष या समाधिस्थ पुरुष असीम है । उनके अन्दर कोई भी भेद भाव नहीं होता-न जाति,न धर्म,न सम्प्रदाय,न नारी,न पुरुष, न देश, न विदेश ।
जो समाधिस्थ होकर उसमें चैतन्य जाग गया, वो शिव हो गया । जो शिव हो गया, उसका सीमा टूट गया । वो सबका हो गया । वो असीम हो गया ।
असीम मतलब सीमा रहित।
सारे सीमा पर उसका प्रकाश है ।
सारे सीमा पर उसकी कृपा दृष्टि है ।
सारे सीमा पर उसका प्रभाव है ।
सारे सीमा से उसको प्रेम है ।
असीम से उसको प्रेम है ।
सद्गुरु के चरणों में शत शत नमन ।🙏
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