एक फूल फूले हैं काशी, ता दूसरे बनारस हो 🌸 | पारंपरिक बघेली सोहर | बघेली लोकगीत
🎵 सुर संसार | SUR SANSAR
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एक फूल फूले हैं काशी, ता दूसरे बनारस हो 🌸 | पारंपरिक बघेली सोहर | बघेली लोकगीत
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🌸 एक फूल फूले हैं काशी,
ता दूसरे बनारस हो...
सखिया! तीसरे फूल फूले मोरे अंगना,
मोरे अचरा चहूँ ओर हो... 🌸
एक पारंपरिक बघेली सोहर, जिसमें
फूलों के सुंदर रूपक के माध्यम से
घर-आँगन की खुशी और नवजीवन के
उत्सव को व्यक्त किया गया है।
🎵 गीत: पारंपरिक बघेली सोहर
🗣️ लोकभाषा: बघेली
🌾 क्षेत्र: बघेलखंड / विंध्य क्षेत्र
🎶 अवधि: 2:32
काशी और बनारस के फूलों के बाद
“मोरे अंगना” का तीसरा फूल —
यही इस लोकगीत की सुंदर कल्पना है। ❤️
यह केवल एक गीत नहीं,
बल्कि हमारी बोली, हमारी लोक-स्मृति
और पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा
का एक हिस्सा है।
🙏 बघेली लोकगीत अमर रहें
🌾 हमारी बोली — हमारी पहचान 🌾
अगर आपको पारंपरिक बघेली लोकगीत,
सोहर और हमारे गाँव-घर की लोक-संस्कृति
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