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sri ishoupnishad mantra 9 day 16

“Cheto Darpan Marjanam – 🙏@SNGM Banglore

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sri ishoupnishad mantra 9 day 16

19 просмотров · 1 дн. назад
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🌸 श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 8 (2)दिवस 15🌸 हरे कृष्ण 🙏 मंत्र 8 स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥ अनुवाद: ऐसा व्यक्ति भगवान को अवश्य जान लेता है जो सर्वशक्तिमान, शरीर-रहित, निष्कलंक, शुद्ध, पाप से रहित, सर्वज्ञ, मन के नियंता, सर्वव्यापी, स्वयंभू तथा सर्वत्र विद्यमान हैं। वे अनादि काल से ही अपनी इच्छा अनुसार सबके लिए कर्तव्य निर्धारित कर रहे हैं। *तात्पर्य के मुख्य बिंदु - *1. कक्षा की शुरुआत निताई प्रिया माताजी ने कक्षा की शुरुआत बहुत ही सुंदर बिंदु से की - महाभागवत और परम पुरुषोत्तम भगवान। माताजी ने बताया कि पिछले बार हमने पढ़ा कि महाभागवत भगवान के बहुत सारे गुण देखते हैं, आम मनुष्य नहीं। भगवान का शरीर आध्यात्मिक होता है, उसमें हमारी तरह नसें नहीं होती। 2. देववाद और कर्मवाद क्या है? माताजी ने भक्तों से प्रश्न किया - देववाद और कर्मवाद क्या है? *देववाद का अर्थ है -* भगवान की इच्छा। *कर्मवाद का अर्थ है -* जो हम कर्म करते हैं, भगवान हमें उसी अनुसार फल देते हैं, पर हमें कर्तव्य करना होता ही है। दोनों ही जरूरी हैं। *उदाहरण -* रोड पर अगर कोई करतब दिखाता है और माँगता है, तो हम कुछ न कुछ जरूर देते हैं। कभी-कभी हम खुश होकर बहुत सारा दे देते हैं। पर वही अगर कोई कुछ न करे, खड़ा रहे, इच्छा न करे, तो हम उसे कुछ नहीं देते। वैसे ही भगवान अपने कर्मों के हिसाब से हमें बहुत कुछ दे सकते हैं। कर्म करने पर ही फल मिलता है। फिर माताजी ने एक भजन गाकर कर्म के बारे में बताया। 3. भगवान को कैसे जाना जा सकता है? भगवद् गीता 9.11-12 में भगवान द्वारा अल्प व्यक्तियों की पतित अवस्था पर खेद प्रकट करना। भगवान शरणागति की मात्रा के अनुसार ही जाने जा सकते हैं। पतन तभी होता है, जब जीव भगवान से संबंधों को भुला देता है। भगवान सारी वस्तुओं को प्रदान करते हैं। जीव की योग्यता के अनुसार प्रदान करते हैं। योग्यता ही काफी नहीं, भगवान की कृपा भी होनी चाहिए। *उदाहरण -* अगर किसी को न्यायालय का न्यायाधीश बनना होता है, तो उसे सिर्फ योग्यता ही नहीं, उच्च अधिकारी की सहमति भी प्राप्त करनी होती है। भगवान हर एक की इच्छा पूर्ति करते हैं। 4. जीव की भूल दुर्भाग्यवश जीव भौतिक चीजें ही माँगता है। जीव बहिरंगा शक्ति के क्षणिक सौंदर्य से मोहित होकर जीवन के असली उद्देश्य को भूल जाता है कि उसे भगवद् धाम जाना होता है। कोई भी भगवान से बड़ा और बराबर नहीं है। जीव तो विकसित है, जो हमेशा भगवान से भौतिक वस्तुएँ ही माँगता रहता है, जब तक कि उसे आध्यात्मिक तथा वैधानिक अनुमति न हो जाए। केवल परमेश्वर ही आत्मनिर्भर हैं। 5. भगवान की बाल-लीलाएँ भगवान की बाल्यकाल की लीलाएं यथा अघासुर, बकासुर तथा पूतना जैसे असुरों का वध करना, यह किसी बाहरी अभ्यास से नहीं होता। भगवान ने बिना कोई अभ्यास किए गोवर्धन पर्वत उठा लिया। *माताजी ने बताया -* भगवान को जिम जाने की जरूरत नहीं है। 6. भगवान शुद्ध हैं, पाप से रहित हैं भगवान शुद्ध हैं, पाप से रहित हैं। और भगवान हमारे पाप को भी जला देते हैं, और गुरु भी। *जैसे -* सूर्य में कीटनाशक शक्ति होती है, वह सारे कीटाणु को जला देता है। सूर्य भौतिक होकर इतना शक्तिमान है, तो भगवान किस तरह शक्तिमान हैं! उनके शरण में जाने से हमें किसी चीज का भय नहीं होता। *माताजी ने एक advertisement का उदाहरण दिया -* जैसे च्यवनप्राश खाने पर एक बच्चे के चारों तरफ कवच जैसा बन जाता है और दूसरे बच्चे के छींकने पर भी उसे कुछ नहीं होता। 7. सारांश भगवान सर्वशक्तिमान हैं, उनको बाहरी चीजों की जरूरत नहीं होती। उन्होंने कभी भी बाहरी चीजों का सहारा नहीं लिया था। भगवान इतने सर्वशक्तिमान हैं कि उनकी शरण में जाने से हमें किसी सुरक्षा की चिंता नहीं होती। श्रील प्रभुपाद ने कहा - हमें भगवान को कभी भूलना नहीं चाहिए, और कहा कि हमें हमेशा भगवान की सेवा में लगना चाहिए। हरे कृष्ण 🙏