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भूल को धूल से मिटाएँ - स्वामी श्रवणानन्द सरस्वती

Swami Shravananand Saraswati

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भूल को धूल से मिटाएँ - स्वामी श्रवणानन्द सरस्वती

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Swami Shravananand Saraswati
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Sri Dungargarh Pravachan - Swami Shravananand Saraswati भूल को धूल से मिटाएँ - स्वामी श्रवणानन्द सरस्वती 🔹 शरीर को मैं मानना दुनिया का सबसे बड़ा पाप (अघ) है - यदि देहाभिमान नहीं तो शुभ-अशुभ कर्मों के फलस्वरूप पाप-पुण्य रहेंगे कहाँ? 🔹अजगर (अघासुर) का रहस्य सुनें। हर चीज़ में “मैं-मैं” करने वाला ही पाप के मुख में जाता है। 🔸 परमात्मा जो कभी कर्ताभावसे भरता नहीं अपने सखाओं के लिए अघमें भी प्रविष्ट हो गए। जहाँ पूर्ण प्रकाश है वहाँ अंधकार की सत्ता कैसे रहेगा? 🔸अन्तःकारणको मैं मानना समाप्ति कैसे हो? 🔸जब तक बहुत काल तक सत्संग न किया जाये यह बात समझमें नहीं आती की - 🔹 मैं अन्तःकारण नहीं हूँ; 🔹अन्तःकरण के दोष मेरे नहीं हैं; 🔹 अन्तःकरण निर्दोष बनेगा भी नहीं! 🔹जब तक यह अपने को अलग मानेगा अन्तःकरण दोषयुक्त ही रहेगा। जिस दिन यह लीन हो जाएगा इसके चार विभाग और उनकी सत्ता ही समाप्त हो जायेंगे। 🔸 गंदा नाला तब तक गंदा तब तक रहेगा जब तक यह गंगा जी से अलग रहेगा। जिस दिन यह गंगाजी से एक हो जाएगा इसका यह नाला का आकार भी नहीं रहेगा और यह नाम भी मिटेग। 🔹निर्दोष बनने के लिए दोष दर्शन करना बंद करो - नहीं तो दोषकार वृत्ति बनेगी। 🔹 दोष दर्शन भी मलिन अंतःकरण का लक्षण है। दूसरे की प्रशंसा सुनकर अथवा सुख देखकर दुःखी होना भी इसी का द्योतक है। #SwamiShravananandSaraswati #Satsang #Pravachan #SriDungargarh #AnandVrindavanAshram