आँख मिली, दृष्टि न मिली
Ambedkar School of Governance
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आँख मिली, दृष्टि न मिली
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🪷 *आँख मिली, दृष्टि न मिली* 🪷
बोधि प्राप्ति के बाद, सारनाथ की ओर जाते हुए बुद्ध का पहला सार्वजनिक संवाद एक अपरिचित परिव्राजक — उपक — से हुआ।
उपक ने बुद्ध को देखा।
उसने उनके तेज को देखा।
उनकी शांति को देखा।
उनकी असाधारण उपस्थिति को देखा।
पर जो देखा गया,
वह पहचाना नहीं गया।
यहीं से जन्म लेता है यह गीत।
*"आँख मिली, दृष्टि न मिली"* केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि मानव अनुभव का शाश्वत रूपक है—
कभी सत्य हमारे सामने खड़ा होता है,
पर भीतर उसे ग्रहण करने की तैयारी नहीं होती।
कभी नदी पास से बहती है,
और प्यास बनी रहती है।
इस गीत में बुद्ध के उपक से हुए संवाद, पालि परंपरा की प्रतिध्वनियाँ, और आत्मप्रकाश की अनुभूति एक सिनेमाई संगीत-यात्रा में रूपांतरित की गई हैं।
🎵 *संगीतात्मक भावभूमि*
राग मारवा की सांध्य-गंभीरता से प्रेरित
धीमी, रहस्यमय और अंतर्मुखी ध्वनि-रचना
🎼 *मुख्य भाव*
• आत्मप्रकाश
• अनपहचाना सत्य
• करुणा
• एकाकी जागरण
• धम्म की प्रथम यात्रा
🪷 *मुख्य पंक्ति*
*"जैसे नदिया पास से बह जाए
और प्यास वही ठहरी रहे..."*
✍️ *गीत एवं संकल्पना:* मंगेश दहिवले
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