जैन दर्शन: त्रिरत्न, पंच महाव्रत और प्रमुख मान्यताएं जैन धर्म और बुद्ध धर्म एक ही विडियो में,,,
Nitya AI
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जैन दर्शन: त्रिरत्न, पंच महाव्रत और प्रमुख मान्यताएं जैन धर्म और बुद्ध धर्म एक ही विडियो में,,,
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स्थापना: जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन श्रमण धर्मों में से एक है।
तीर्थंकर: जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर (धर्म के प्रवर्तक/मार्गदर्शक) हुए हैं।
प्रथम तीर्थंकर: भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ)।
अंतिम एवं 24वें तीर्थंकर: भगवान महावीर स्वामी, जिन्हें जैन धर्म का वास्तविक पुनरुद्धारक माना जाता है।अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना (यह जैन धर्म का मूल आधार है)।
सत्य: हमेशा सच बोलना।
अस्तेय: चोरी न करना या बिना अनुमति किसी की वस्तु ग्रहण न करना।
ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर संयम रखना और पवित्र जीवन जीना।
अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक धन या वस्तुओं का संचय न करना।अनेकांतवाद / स्याद्वाद: जैन दर्शन के अनुसार सत्य के कई पहलू हो सकते हैं और किसी भी वस्तु को देखने के अनेक दृष्टिकोण होते हैं। इसे 'अनेकांतवाद' और सापेक्षवाद को 'स्याद्वाद' कहा जाता है।
कर्म सिद्धांत: जैन धर्म कर्म पर बहुत जोर देता है। इसके अनुसार, जैसा व्यक्ति कर्म करता है, वैसा ही फल उसे भुगतना पड़ता है। आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करना ही जीवन का मुख्य लक्ष्य है।
अहिंसा परमो धर्मः: जैन धर्म में अहिंसा को सबसे सर्वोच्च धर्म माना गया है।जैन दर्शन: त्रिरत्न, पंच महाव्रत और प्रमुख मान्यताएं