मानस-प्रबोध | मनाचे श्लोक क्रमांक - १० | निरुपणकार - श्री. विनीत जोशी
Shree Chaitanya Ram
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सदा सर्वदा प्रीती रामीं धरावी।
दुःखाची स्वयें सांडी जीवी करावी॥
देहेदु:ख ते सूख मानीत जावे।
विवेके सदा स्वस्वरुपीं भरावें॥१०॥