चुड़ैल की बतख की अंडे | Horror Stories |CHUDAIL DUCK EGG | Darawni Kahani |Hindi Moral Cartoon
moral horror toon
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चुड़ैल की बतख की अंडे | Horror Stories |CHUDAIL DUCK EGG | Darawni Kahani |Hindi Moral Cartoon
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चुड़ैल की बत्तक की अंडे | Horror Stories | CHUDAIL DUCK EGG | Darawni Kahani | Hindi Moral Cartoon
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STORY SCRIPT:
Narrator- बकुल डांगा गाँव के पास एक घना जंगल था…. उसके पास से होकर बहती थी काजला नदी….. नदी के किनारे एक झोपड़ी में एक डायन रहती थी…. जिसके पास बत्तखों का एक झुंड था…. डायन अपनी बत्तखों से अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी…..
डायन- आओ आओ चई चई, मेरे बत्तख सोने कहाँ गए सब…. मैं जो तुम्हारी डायन माँ खुद भूखी रहकर तुम्हें खिलाती हूँ…. धान चावल सब चुनकर लाकर तुम्हारी थाली भरती हूँ…. आओ आओ चई चई…..
Narrator- पास की नदी में ही डायन की बत्तखें चरने जाती थीं…. लेकिन डायन की बत्तखें कभी भी जमीन पर अंडे नहीं देती थीं, वे हमेशा नदी के बीच में जाकर अंडे देती थीं और अंडे नदी के पानी में तैरते हुए चले जाते थे…. यह देखकर एक दिन डायन….
डायन- ओह…. ओह फिर से बत्तखों ने नदी के बीच में जाकर अंडे दे दिए…. क्यों?? क्यों रे बच्चों… तुम्हें मेरे घर में अंडे देने में क्या परेशानी है….. इस तरह आधे अंडे तो मुझे मिलते ही नहीं हैं…. आज फिर मुझे नाव लेकर अंडे खोजने जाना पड़ेगा….. चलो तुम्हें घर ले चलती हूँ…..
Narrator- इसके बाद डायन अपनी बत्तखों को बुलाकर घर ले जाती है…. इस खेदी डायन को सिर्फ एक ही लालच था… उसे बत्तख के अंडे खाना बहुत पसंद था…. बत्तख के अंडे का ऑमलेट और पांताभात खाए बिना उसका दिन ही नहीं चलता था…. हर दिन की तरह डायन अपनी नाव और बाँस से बंधा जाल लेकर नदी से अंडे निकालने जाती है….
डायन- धत तेरे की, अंडे सब तैरते-तैरते कहाँ चले गए… मुझे तो मिल ही नहीं रहे हैं….. हर दिन मेरी बत्तखें कितने-कितने अंडे देती हैं…. सब इस नदी के पानी में तैरकर चले जाते हैं….
Narrator- यह कहते-कहते डायन अपना जाल नदी में डालती है और फिर निकालकर देखती है कि उसमें सिर्फ जलकुंभी ही आई है…. इस तरह कई बार नदी में जाल डालने के बाद डायन को सिर्फ 3-4 अंडे ही मिलते हैं…..
डायन- नहीं, अब उस तरफ नहीं जा सकती, उस तरफ तो गाँव शुरू हो रहा है…. अगर गाँव वालों ने मुझे देख लिया तो बहुत बड़ी मुसीबत हो जाएगी…. मैं इन तीन-चार अंडों को लेकर आज वापस चली जाती हूँ….
Narrator- यह कहकर डायन दुखी मन से अपनी नाव लेकर वापस चली जाती है…. इधर उस समय गाँव के नदी के घाट पर पुटी की माँ और भोला की माँ कपड़े धो रही थीं और बर्तन माँजने बैठी थीं…….. वे देखती हैं……
पुटी की माँ- अरे देखो, आज फिर नदी के पानी में कितने अंडे तैरकर आ रहे हैं….. लेकिन रोज-रोज जंगल की तरफ से इतने बत्तख के अंडे तैरकर कहाँ से आते हैं.. क्या पता बापू….. जंगल की नदी में कोई बत्तख पालता है क्या..….. नाना, जल्दी से अंडे उठा लो……
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