🧘 भक्ति के 3 रूप कौन से हैं? सात्त्विक, राजसी और तामसी भक्ति | ओशो
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🧘 भक्ति के 3 रूप कौन से हैं? सात्त्विक, राजसी और तामसी भक्ति | ओशो
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भक्ति एक है, फिर मनुष्य ने उसे 3 भागों में क्यों बाँट दिया? | ओशो
भक्ति का स्वाद एक ही है, लेकिन मनुष्य के स्वभाव अलग-अलग होने के कारण भक्ति भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। ओशो इस प्रवचन में नारद के बताए सात्त्विक, राजसी और तामसी भक्ति के रहस्य को गहराई से समझाते हैं।
ओशो बताते हैं कि पराभक्ति में कोई मांग नहीं होती। परम भक्त परमात्मा से कुछ मांगता नहीं, बल्कि जो मिला है उसके लिए धन्यवाद और कृतज्ञता व्यक्त करता है।
क्या मोक्ष की इच्छा भी एक प्रकार की इच्छा है?
क्या परमात्मा को पाने की चाह भी परमात्मा के मार्ग में बाधा बन सकती है?
सात्त्विक, राजसी और तामसी भक्ति में क्या अंतर है?
और क्यों कहा गया है—“जो मांगता नहीं, उसे मिल जाता है।”
इस प्रवचन में स्वर्ग, नरक, इच्छाओं, वासनाओं और मनुष्य की आकांक्षाओं के माध्यम से ओशो भक्ति के एक अत्यंत गहरे रहस्य की ओर संकेत करते हैं।
🙏 सुनिए, समझिए और स्वयं के भीतर देखिए—आपकी भक्ति किस प्रकार की है?
ओशो का संदेश:
परम भक्ति मांगना नहीं, बल्कि अहोभाव, धन्यवाद और कृतज्ञता है।
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