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BALANAND BRAMCHARI | बालानंद ब्रहमचारी | जिन्होंने गुरू दक्षिणा में आत्मज्ञान प्राप्त किया

BHAKTI DARSHAN TV99

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BALANAND BRAMCHARI | बालानंद ब्रहमचारी | जिन्होंने गुरू दक्षिणा में आत्मज्ञान प्राप्त किया

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#saintsofindia #Balanandbramchari #yogi नमस्कार ... मैं आशीष कुमार .... भारत के महान संतों की कड़ी में .... एक और महान संत ... .... बालानंद ब्रहमचारी केे जीवन चरित्र को लेकर .... आपके सामने हाजिर हूं। यह चैनल .. भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा के लिए समर्पित है। कृपया चैनल को सब्सक्राइब कर लें। बलानंद ब्रहम्चारी का जन्म .... उज्जैन के एक ... सारस्वत ब्राह्रमण परिवार में हुआ था। बालानंद ब्रहचारी के ... बचपन का नाम ... पीताम्बर था। परिवार का प्रमुख कार्य ... पंडितायी था। पुरोहित कर्म ... और कर्मकांड से ... घर का खर्चा चलता था। बालानंद ब्रहमचारी का मन .... बचपन से ही ... अध्यात्म की ओर था। जब वे छोटे थे .... क्षिपा नदी के तट पर स्थित ... गोरखनाथ की गुफाओं में घूमते हुए .... अपना पूरा दिन गुजार देते थे। उनका मन किताबी पढ़ाईयों में नहीं लगता था। इस बात से ..... उनकी मां नर्मदा बाई बहुत चिंतिंत रहती थीं। पीतांबर के सिर से .... पिता का साया बचपन में उठ गया। पति की मृत्यु के बाद .... घर की सारी जिम्मेदारी नर्मदा बाई के कंधों पर आ गई। कमाने वाले मुखिया की मृत्यु के बाद .... घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रही। नर्मदा बाई को चिन्ता थी ... पीतांबर न तो खेती बाड़ी में रूचि लेता है और न ही उसका मन अध्ययन में है। वेद शास्त्रों के ज्ञान में भी उसे कोई रूचि नहीं है। वह पिता के पुरोहित कर्म की विराहत को कैसे सम्हालेगा। इस बात को लेकर ... नर्मदाबाई अपने पुत्र पीताम्बर को ... अक्सर डांटती रहती थीं। एक दिन ... नर्मदा बाई ने नाराज होकर ... अपने पुत्र से कहा ... जब तुम कुछ नहीं करोगे तो क्या साधु बनोगे। मां नर्मदा बाई की बात ... पीताम्बर के मन को गहरे तक छू गई। ... इस बात ने ... पीताम्बर के अंतर्मन के संस्कारों को जगा दिया। संकल्पित मन के साथ .... पीताम्बर मां के सामने से उठकर चला गया। बालक पीताम्बर ने ... अपने सारे कपड़े जला दिए। अपने पूरे शरीर पर ... भस्म लपेट ली। मां के सामने आकर .... पीताम्बर ने कहा .... देखो मां मैं सचमुच साधु बन गया। बालक पीतांबर की यह हरकत देखकर मां खूब हसी। लेकिन पीतांबर का .... यह साधु वेश केवल खेल नहीं था। यह उसके आध्यात्मिक संस्कारों की अभिव्यक्ति थी। भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की झलक थी। कुछ दिनों बाद ... बालक पीतांबर का ... उपनयन संस्कार संपन्न हुआ। उपनयन संस्कार के कुछ दिन बाद ही .... पीतांबर ने घर त्याग दिया। उस समय... पीतांबर की आयु ... महज नौ बर्ष थी। मां की ममता भी .... पीतांबर को बांध नहीं पाई। नौ साल की उम्र में जब ... पीतांबर सारा माया मोह त्यागकर .... सत्य की तलाश में निकल पड़े थे .... तब उन्हें भी नही पता था ... उनकी तलाश कब और कैसे पूरी होगी। वे उदासीन भाव से ... आगे बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में ... उनकी मुलाकात .... एक व्यक्ति से हुई। वह व्यक्ति .... साधु वेश में ठग था। उपनयन संस्कार के समय मिले .... सोने के आभूषण .... पीतांबर ने .... अपने शरीर पर पहने हुए थे। साधु वेश में मिला ठग .... बालक पीतांबर के वेश को देखकर समझ गया .. यह बालक .... घर से भागा हुआ है। ... पीतांबर के आभूषणों को देखकर ... उसके मन में ... लालच आ गया। उसने ....पीतांबर के से कहा... बच्चा ...तुम्हारे शरीर पर .... ये आभूषण रहेंगे तो ..... चोर - डाकू तुम्हारा पीछा करेंगे। .... आभूषण पहनकर .... यात्रा करना ठीक नहीं। ... आभूषणों को मेरे पास छोड़ दो ... लोटते समय ले लेना। ... बालक पीतांबर ने ... निर्विकार भाव से ... अपने सारे सोने के आभूषण ... उस ठग को दे दिए। नर्मदा नदी की परिक्रमा करते हुए .... पीतांबर ... ब्रहाानंद जी महाराज के ... आश्रम में पहुंच गए। आश्रम में ... अखण्ड दीप और ... धुनी प्रज्वलित हो रही थी। बालक पीतांबर ... ब्रहमानंद महाराज के ... चरणों के पास जाकर बैठ गया। ब्रहमानंद महाराज के पास बैठते ही ... पीताम्बर की आत्मा जाग्रत हो उठी। उसने .... ब्रहमानंद जी से हाथ जोड़कर निवेदन किया ... वे उसे अपनी शरण में ले लें। ब्रहमानंद महाराज जी ने ... बालक पीताबंर के चेहरे की तरफ देखा। ब्रहमानंद महाराज के सामने ... पीताबंर का भूत भविष्य सब प्रकट हो गया। ब्रहमानंद महाराज ने ... पीताबंर को ... सावन महीने की पूर्णिमा को दीक्षा दी। दीक्षा के बाद ... पीतांबर का नाम ... पीताबंर से .... बालानंद ब्रहमचारी हो गया। बालानंद ब्रहमचारी ने .... दीक्षा के बाद ... लोगों को प्रसाद ग्रहण कराने के लिए ... भंडारे का आयोजन कराने का संकल्प लिया। लेकिन वे चिंतिंत थे ... भंडार के लिए अन्न की व्यवस्था कहां से होगी। भंडारे में ... आसपास के सभी गांवों के लोगों .... साधु संतों को आमंत्रित किया गया था। बालानंद ब्रहमचारी के मुख पर ... हर समय एक ... आकर्षक तेज छाया रहता था। वे अपने व्यक्तित्व से ... लोगों को सहज ही आकर्षित कर लिया करते थे। बालानंद ने ... दीक्षा ग्रहण करने बाद ... गुरू दक्षिणा के बारे में ... ब्रहमानंदजी से पूछा ... तो वे बोले ... सद्गुरू सब प्रकार की ... कामना वासनाओं से परे होते हैं। उन्होंने बालानंद से कहा ... गुरूदक्षिणा ... ऋद्धि में नहीं सिद्धि में है। मैंने जो मंत्र बताया है ... उसे अपने पुरूषार्थ से सिद्ध करो और आत्मज्ञान प्राप्त करो ... वही मेरे लिए असली गुरूदक्षिणा होगी। इसके बाद शुरू हुई बालानंद की कठोर साधना। बालानंद कई वर्षों तक देश के सभी तीर्थ - स्थलों और अन्य स्थलों का भ्रमण करते रहे। बीच - बीच में वे गुरू ब्रहाानंद का दर्शन करते रहे। यह सिलसिला ब्रहानंद के महाप्रयाण तक चलता रहा।