विद्या विस्तार का तंत्र विनिर्मित करने की आवश्यकता? | शिक्षा ऐसी हो जो इंसान बनाए |
Yug Sahitya
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विद्या विस्तार का तंत्र विनिर्मित करने की आवश्यकता? | शिक्षा ऐसी हो जो इंसान बनाए |
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भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी और पैसा कमाना है?
या शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे मनुष्य तैयार करना भी है, जिनमें श्रेष्ठ विचार, संस्कार, चरित्र, सेवा-भाव, जिम्मेदारी और मानवता का विकास हो?
अखण्ड ज्योति – अक्टूबर 1992 के इस महत्वपूर्ण लेख “विद्या विस्तार का तंत्र विनिर्मित करने की आवश्यकता” में शिक्षा के इसी व्यापक उद्देश्य पर गहन विचार किया गया है।
लेख में बताया गया है कि रोटी जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन मनुष्य का जीवन केवल रोटी तक सीमित नहीं है। आजीविका की शिक्षा के साथ ऐसी विद्या भी आवश्यक है जो मनुष्य की चेतना को परिष्कृत करे और उसमें ओज, तेज, वर्चस्, आदर्शवादिता तथा लोकसेवा की भावना जगाए।
प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक शिक्षा संस्थानों तक, ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि प्रतिभाओं और व्यक्तित्वों का निर्माण हुआ।
इस लेख का सबसे बड़ा संदेश है—
“शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो केवल कमाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाला श्रेष्ठ मनुष्य तैयार करे।”
अंत में दिया गया सेठ और उसके बेटे का प्रसंग हमें यह गहरी सीख देता है कि हम जीवनभर धन-संपत्ति जुटाते रहें, लेकिन यदि अपनी आत्मा और चरित्र को भूल जाएँ, तो हमारी सारी उपलब्धियाँ अधूरी रह जाती हैं।
📖 स्रोत: अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1992
✍️ विचार: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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