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बाबा घुइसरनाथ धाम - ज़िला प्रतापगढ़ के दिव्य दर्शन 🚩🚩। गुइसरनाथ मंदिर | Baba Ghuisarnath Dham 2026

Pind to Pardes

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बाबा घुइसरनाथ धाम - ज़िला प्रतापगढ़ के दिव्य दर्शन 🚩🚩। गुइसरनाथ मंदिर | Baba Ghuisarnath Dham 2026

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बाबा घुइसरनाथ धाम (घुश्मेश्वरनाथ मंदिर) उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित एक बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। यह पावन धाम सई नदी के तट पर बसा हुआ है और शिव भक्तों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है। शिव महापुराण में वर्णित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम (बारहवें) 'घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग' के रूप में इस स्थान की बहुत मान्यता है । 1. मुख्य विवरण और स्थिति (Location) स्थान: लालगंज अझारा तहसील (कुम्भापुर/इलापुर क्षेत्र), जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। दूरी: प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 35–42 किलोमीटर और प्रयागराज (इलाहाबाद) से करीब 70 किलोमीटर। मुख्य नदी: यह मंदिर पवित्र सई नदी के किनारे स्थित है, जो इसकी सुंदरता और शांति को बढ़ाती है। 2. पौराणिक कथा और इतिहास (Mythology & History) इस धाम के नाम और स्थापना के पीछे दो प्रमुख कथाएँ प्रचलित हैं: कथा 1: माता घुश्मा और सुधर्मा की कथा (शिव पुराण के अनुसार) नदी के किनारे सुधर्मा नाम के एक ब्राह्मण और उनकी पत्नी सुदेहा रहते थे। वे संतानहीन थे, जिसके कारण सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी छोटी बहन घुश्मा से करवा दिया। घुश्मा भगवान शिव की परम भक्त थीं। वह रोज मिट्टी के पार्थिव शिवलिंग बनातीं, पूजा करतीं और पास के तालाब में विसर्जित कर देती थीं। शिव कृपा से घुश्मा को एक पुत्र हुआ। ईर्ष्या के वश में आकर बड़ी बहन सुदेहा ने उस पुत्र की हत्या कर दी और शव को उसी तालाब में फेंक दिया जहाँ घुश्मा शिवलिंग विसर्जित करती थीं। पुत्र की मृत्यु की खबर मिलने के बाद भी घुश्मा विचलित नहीं हुईं और अपनी शिव पूजा में लीन रहीं। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव साक्षात प्रकट हुए और उनके पुत्र को जीवित कर दिया। भगवान शिव ने जब वरदान मांगने को कहा, तो घुश्मा ने प्रार्थना की कि लोक-कल्याण के लिए प्रभु हमेशा वहीं निवास करें। तब से भगवान शिव वहाँ घुश्मेश्वर नाथ (जो समय के साथ स्थानीय भाषा में घुइसरनाथ हो गया) के नाम से स्थापित हो गए। कथा 2: घुइसर यादव की कहानी (स्थानीय मान्यता) एक अन्य स्थानीय लोककथा के अनुसार, यहाँ 'घुइसर' नाम के एक व्यक्ति रहते थे। शुरुआत में उनकी ईश्वर में बहुत आस्था नहीं थी, लेकिन एक बार अनजाने में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं कि उन्हें भगवान भोलेनाथ के साक्षात दर्शन और चमत्कार का अनुभव हुआ। उनके नाम पर भी लोग इस स्थान को 'घुइसरनाथ धाम' कहने लगे। 3. भगवान श्री राम और दिव्य करील वृक्ष एक और बेहद खास मान्यता यह है कि भगवान श्री राम जब वनवास जा रहे थे, तब उन्होंने सई नदी के स्वच्छ जल में स्नान किया था और यहाँ बाबा घुश्मेश्वर के दर्शन किए थे। माना जाता है कि विश्राम के दौरान उनके शरीर से पसीने की एक बूंद जमीन पर गिरी, जिससे वहाँ एक दिव्य करील का वृक्ष उत्पन्न हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसका संकेत दिया है। आज भी श्रद्धालु बाबा के जलाभिषेक के बाद इस संरक्षित करील वृक्ष की पूजा करते हैं। 4. प्रमुख पर्व और उत्सव सावन का महीना: सावन के महीने में यहाँ भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है। लाखों श्रद्धालु माणिकपुर घाट, गोकना घाट या कालाकांकर (गंगा नदी) से कांवड़ में जल भरकर पैदल आते हैं और बाबा पर जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि: महाशिवरात्रि पर यहाँ विशाल तीन दिवसीय मेला लगता है और भव्य स्तर पर पूजा-अर्चना की जाती है। नियमित दिन: साल भर हर सोमवार और मंगलवार को यहाँ विशेष भीड़ रहती है। मन्नत पूरी होने पर लोग यहाँ घंटा बांधते हैं, कड़ाही चढ़ाते हैं और रामचरितमानस का पाठ करवाते हैं। #babaghuisarnath #babaghuisarnathdham #sangipur #lalganj #lalganjajhara #amethi #partapgarh