Meghnad Vaddhh (Laxman vs Indrajeet) - Smokey | "The Final Battle" | Ramayan Energetic Rap Song
Smokey
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Meghnad Vaddhh (Laxman vs Indrajeet) - Smokey | "The Final Battle" | Ramayan Energetic Rap Song
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Smokey
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Meghnad Vaddhh(मेघनाद वध) - Smokey | The Final Battle | Ramayan Motivational Rap Song | 2026
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🔶 CREDITS 🔶
▪️Song :- Meghnad Vaddhh
▪️Rap, Music :- Smokey
▪️Lyrics :- Smokey & Wasuki
▪️Mix & Master :- Abhay Tiwari
▪️Poster :- NPS Design
▪️Video :- Bhakti Mixture
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🔶 Lyrics 🔶
इन्द्रजीत:
“लक्ष्मण…
मैं साधारण योद्धा नहीं।
मैं रावणपुत्र मेघनाद हूँ —
जिसके नाम से इन्द्रासन डोल उठा था।
तुम तो केवल वनवासी के अनुज हो।
आज तुम्हारा अस्तित्व भी इस रणभूमि में विलीन हो जाएगा।”
जिसके नाम से काँपे तीनों लोक…
महादेव का जिसके सिर पे हाथ…
देवों को रखता जो डरा के…
उस रावण का पुत्र मैं मेघनाद…
मैं चलता चलूँ प्रलय की चाल…
मेरे वार का बस मृत्यु जवाब…
हर रण में अजय, न देखी हार…
मेरा नाम ही दूजा सर्वनाश…
हे वनवासी तेरी क्या बिसात…
मैं स्वर्गविजयी, देवों का त्रास…
देवेन्द्र भी माँगे प्राणदान…
सब इंद्रजीत मुझे कहते हैं…
मेरी माया शक्ति का न तोड़ कोई…
साहस में मुझसा कोई और नहीं…
ब्रह्मास्त्र, वैष्णव, पाशुपत…
तरकश की शान बढ़ाते हैं…
हो चाहे तुम अवतार शेष के…
या राम हो खुद नारायण भी…
जो विरुद्ध खड़ा मेरे पिता के…
मेरी दृष्टि में वो मृत्यु लायक ही…
आज प्रलय होगा इस रण में…
जब वर्षा होगी मेरे बाणों की…
आज दूँगा पिता को भेंट मैं…
तुम दोनों भाइयों के प्राणों की…
मेघनाद:
“लक्ष्मण!
तुम्हारे प्राण आज मेरे बाणों की अग्नि में भस्म हो जाएँगे।
देवता भी मेरे अस्त्रों से काँप उठते हैं!”
लक्ष्मण:
अधर्म के बल पर जीती हुई हर विजय क्षणिक होती है, मेघनाद।
धर्म के लिए उठाया गया मेरा एक बाण
तुम्हारे सारे मायाजाल को भस्म कर देगा!”
तुमने देवों को परास्त किया होगा,
पर धर्म को नहीं।
मैं लक्ष्मण हूँ
और
आज तुम्हारा सामना किसी साधारण धनुर्धर से नहीं —
धर्म की प्रतिज्ञा से है।”
ये तू नहीं, तेरा अहंकार…
जो बोल रहा राक्षस कुमार…
तेरी मृत्यु खड़ी तेरे समक्ष…
न माया से भी बचते आज प्राण…
तू बढ़-चढ़कर बस नाद करे…
जो होते वीर, वो वार करें…
हूँ रामानुज, निर्भय प्रतीक…
तेरी हर चुनौती स्वीकार मुझे…
था सीना तान खड़ा परशुराम जी के आगे, वो रघुवंशी मैं…
न शूरवीर कह खुद को तू…
तो बस माया का बंदी है…
हूँ साधारण एक मानव, पर भयभीत नहीं तेरी बातों से…
वनवासी हूँ, पर कायर नहीं…
तेरी मृत्यु लिखी मेरे हाथों से…
तेरे पिता ने जो अपराध किया…
बस अंधकार है फल उसका…
अधर्म का आशय अंत ही है…
कभी सगा हुआ न कल उसका…
न प्राण रहेंगे, न अहंकार…
न काम आएगा छल तेरा…
मुझे आन है मेरे भैया की…
ये होगा आखिरी रण तेरा…
इन्द्रजीत (क्रोधित स्वर में):
“लक्ष्मण! अभी भी अवसर है।
अपने राम के पास लौट जाओ।
अन्यथा इस क्षण के पश्चात् तुम्हारा नाम लेने वाला भी कोई न रहेगा।”
लक्ष्मण
“रघुवंशी रणभूमि में मृत्यु से नहीं घबराता।
प्राण देकर भी धर्म की रक्षा करता है।
मेघनाद,
आज यह रण साक्षी बनेगा —
कि शक्ति महान है
या सत्य।”
अब मेघनाद ने उठा धनुष, फिर लक्ष्मण पर प्रहार किया…
लक्ष्मण भी कहाँ पीछे थे, हर वार का प्रतिकार किया…
इस रणभूमि में देख प्रदर्शन दो वीरों के शौर्य के…
था तीनों लोक में कोई नहीं ऐसा, जो न भयभीत हुआ…
वो लड़ते जाते एक-दूजे से, तीर से काटे तीर कई…
बाणों से बन गए बादल थे, न समर का था परिणाम कोई…
अदृश्य होकर रावण कुमार, अब करने लगा था युद्ध कपट…
न ज़रा भी वो भयभीत हुए, साहस से डटे थे वीर लखन…
न आई नज़र जब ज़रा भी शंका मेघनाद को लखन के मुख पे…
तो करने को वध शत्रु का, ब्रह्मास्त्र से उसने वार किया…
ब्रह्मास्त्र होकर लौटा तेजहीन, तो पाशुपत का ध्यान किया…
हुआ अस्त्र विलुप्त करके प्रणाम, तो इंद्रजीत हैरान हुआ…
फिर बना लक्ष्य लक्ष्मण को उसने
नारायणास्त्र से घात किया…
करे शेष पे कैसे वार, अस्त्र कर प्रदक्षिणा वो लौट गया…
ये देख अचंभित इंद्रजीत कहे—गलत ये मेरा अनुभव नहीं…
जो रहे अछूत त्रिदेव शक्ति से
वह साधारण कोई मानव नहीं…
रणभूमि छोड़ फिर इंद्रजीत
गया पिता को अपने समझाने…
बोला—हरण किया जिस सीता का
वह सम्पूर्ण जगत की माता है…
चले जाओ हरि की शरण में
तो होगा इस कुल का नाश नहीं…
बाकी टल सके इस अंत को
है ऐसा दूजा उपचार नहीं…
फिर बोला अहम में दशानन—
तुम कायर हो, हाँ वीर नहीं…
जो छोड़ के भागा रणभूमि में
देख मृत्यु को समक्ष खड़ी…
फिर पिता के मुख से “कायर” सुन
था उबल गया इंद्रजीत का रक्त…
फिर निःसंकोच
भगवान से लड़ने चला गया वह पितृभक्त…
फिर दोनों वीर थे खड़े
एक-दूजे के समक्ष एक और बार…
मेघनाद के मुख पर अभिमान
लक्ष्मण का क्रोध सीमा से पार…
तभी मेघनाद यूँ दे चुनौती
लक्ष्मण पर करे घातक प्रहार—
“या तू नहीं या फिर मैं नहीं
यह इस युद्ध का है अंतिम पड़ाव…”
वहाँ लखन भी थे तैयार खड़े
कहे—मृत्यु ही दूँगा आज तुझे…
न बचा सकेंगे आकर स्वयं
भगवान भी आज ये प्राण तेरे…
फिर बोल के “जय श्री राम” लखन ने
अमोघ बाण का ध्यान किया…
प्रत्यंचा छूटते ही क्षण भर में
सिर मेघनाद का काट दिया…
“क्या… यही… धर्म की शक्ति है…?”
“यह शक्ति नहीं, मेघनाद।
यह धर्म का न्याय है।
अहंकार चाहे जितना प्रबल हो,
उसका अंत निश्चित है।
सत्य विलंब से विजय पाता है…
परंतु उसकी विजय शाश्वत होती है।”
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