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रामायणी साधना सत्संग बालकांडभाग- १३ ‪@bhaktimeshakti2281‬

Bhakti me Shakti

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रामायणी साधना सत्संग बालकांडभाग- १३ ‪@bhaktimeshakti2281‬

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Ram bhakti ‪@bhaktimeshakti2281‬ परम पूज्य डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से ((2097)) रामायणी साधना सत्संग बालकांड भाग- १३ अहिल्या सुबह आपसे अर्ज करी गई थी की इसे थोड़ा विस्तार पूर्वक देखेंगे । यह अहिल्या कौन है ? ब्रह्मा की पुत्री है । कहते हैं अति सुंदर, बहुत सुंदर । तभी तो बुद्धि की प्रतीक है । बुद्धि भी तो हमारी अति सुंदर है । यदि विवेक युक्त है, ठीक दिशा में लगी हुई है, तो अति सुंदर है । इसी के कारण तो हम बुद्धि जीव हैं, इसी के कारण तो हम मानव हैं । यदि यह हमारे अंदर ना होती तो हम भी कहीं पशु पक्षी, इत्यादि कीट इत्यादि बने हुए होते । इसी के कारण, इसी बुद्धि के कारण हम बुद्धिजीवी हैं, मानव हैं, इसी की उत्कृष्टता के कारण । विवेक युक्त यदि बुद्धि है, ज्ञान युक्त यदि बुद्धि है, परमेश्वर के श्री चरणों में लगी हुई बुद्धि है, तो इस जैसी सुंदरता और किसी में नहीं । अहिल्या अति सुंदर है । इंद्र को पता लग गया है । ब्रह्मा जी ने एक बहुत सुंदर पुत्री की सृष्टि करी है । मैं स्वर्ग का देवता हूं, मालिक हूं । इसका विवाह मेरे साथ ही करेंगे। यह अपने मन में उसने ठान ली । ब्रह्मा जी के पास एक और व्यक्ति भी है जिसे महर्षि गौतम कहते हैं । दो लोग हैं इस अहिल्या को पाने वाले । देखते हैं ब्रह्मा जी महाराज किस को चुनते हैं । एक का भोगी जीवन है, दूसरे का त्यागी जीवन है । मानो यह संकेत दे रहे हो ब्रह्मा जी महाराज हमारी बुद्धि को, भोगी जीवन की ओर जाना चाहिए या हमारी बुद्धि को त्यागी जीवन की ओर जाना चाहिए । आखिर वह त्यागी जीवन को ही, तपस्वी जीवन को ही चुनते हैं ।‌ मानो हमारी बुद्धि कैसी भी है, कैसी भी क्यों ना हो, इस बुद्धि को त्याग के साथ जुड़ना चाहिए, इस बुद्धि को तप के साथ जुड़ना चाहिए ना कि भोग के साथ । जब भोग के साथ जुड़ जाती है, तो यह बुद्धि जड़ बुद्धि हो जाती है । विवाह तो महर्षि गौतम के साथ अहिल्या का हो गया । ब्रह्मा जी बहुत समझदार पिता है। इसलिए विवाह जो है वह महर्षि गौतम के साथ कर दिया । लेकिन इंद्र भूल नहीं पा रहा। इस बात को । उसने अपना अपमान ही माना है इसको । लेकिन साथ ही साथ वह अहिल्या के सौंदर्य को याद करता रहता है। किसी ना किसी ढंग से इसे पाकर रहूंगा । आज कूटनीति का प्रयोग करके, जानता है महर्षि गौतम सुबह-सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के लिए बाहर जाते हैं। आज उससे भी पहले, मानो इंद्र देवता को सारी रात नींद नहीं । आई कुकर्म करने जा रहा है । कुकर्म करना, पाप करने के लिए नींद नहीं आई, सारी रात सोया नहीं क्या किया है ? रात नींद नहीं आई । कुकर्म करने जा रहा है। कुकर्म करना, पाप कर्म करने के लिए नींद नहीं आई । सारी रात सोया नहीं । क्या किया है ? ब्रह्म मुहूर्त थोड़ा पहले कर दिया है । मानो जैसे महर्षि गौतम की आंख खुली, उसे लगा बहुत जल्दी सवेरा हो गया है । थोड़ा प्रकाश सा इस प्रकार का कर दिया और महर्षि गौतम स्नान के लिए चल पड़े । जाते-जाते स्नान करने के लिए अभी नदी तक पहुंचे नहीं, रास्ते में ही देखा मुझे गलती लगी है । यह समय स्नान करने का नहीं, वापस मुड़ आए । वह सब कुछ तो इंद्र ने माया के अनुसार किया हुआ था । माया का जाल रचा हुआ था । उस वक्त प्रभात नहीं थी अभी ।