अपना-अपना भाग्य: समाज की निष्ठुरता और एक मासूम का अंत | जैनेंद्र कुमार की मार्मिक कहानी
Sahitya Kosh
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अपना-अपना भाग्य: समाज की निष्ठुरता और एक मासूम का अंत | जैनेंद्र कुमार की मार्मिक कहानी
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"दुनिया की भीड़ में किसका भाग्य कहाँ सो गया, किसी को खबर नहीं।"
हिंदी साहित्य के महान लेखक जैनेंद्र कुमार की कालजयी कहानी 'अपना-अपना भाग्य' हमारे समाज के उस काले चेहरे को उजागर करती है, जहाँ अमीरों की सुख-सुविधाओं के बीच एक गरीब बच्चे की पुकार अनसुनी रह जाती है।
इस कहानी के मुख्य बिंदु:
नैनीताल की ठिठुरती ठंड: कहानी की शुरुआत नैनीताल की कड़ाके की ठंड से होती है, जहाँ अमीर लोग सैर-सपाटे में व्यस्त हैं।
एक असहाय बालक: एक 10-12 साल का छोटा बच्चा, जो काम की तलाश में घर से भागा है, लेकिन समाज की बेरुखी उसे सिर्फ दुत्कार देती है।
मध्यम वर्ग की उदासीनता: लेखक और उनके मित्र उस बच्चे की मदद करना तो चाहते हैं, लेकिन अपनी सुविधाओं और आलस्य के कारण उसे मरने के लिए छोड़ देते हैं।
नियति का क्रूर प्रहार: अगले दिन वही बच्चा सड़क किनारे बर्फ में जमा हुआ मृत मिलता है। लोग इसे केवल 'अपना-अपना भाग्य' कहकर भूल जाते हैं।
यह कहानी हमें झकझोरती है और सवाल करती है कि क्या किसी की गरीबी और मौत वाकई सिर्फ उसका 'भाग्य' है या हमारी सामूहिक संवेदनहीनता?
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