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श्री महाराज जी द्वारा भावपूर्ण कीर्तन: नैनन नीर ढरे रैन दिन | Nainan Neer Dhare Rain-Din ||

RadhePremi

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श्री महाराज जी द्वारा भावपूर्ण कीर्तन: नैनन नीर ढरे रैन दिन | Nainan Neer Dhare Rain-Din ||

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Kirtan and Explanation by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj in (Mangarh, 1987). Translation Provided Below: ------------------------------------------------------------------------------------------ प्रेम रस मदिरा - विरह माधुरी (१५४) रैन-दिन नैनन नीर ढरे एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! अब तो दिन रात आँखों से आँसू बहा करते हैं जब ते लखी मंजु सो झाँकी, कुंज लतान तरे जब से लता-कुंज में उस मनोहर झाँकी को देखा है भनत बनै न नैन चितवनि अति, रतिरस रंग भरे उनकी आँखों को वह चितवनि जिनमें अति प्रेम भरा हुआ था अनिर्वचनीय है ललित त्रिभंग अनंग विमोहन, मृदु मुसकात खरे वे तीन स्थान से टेढ़े, कामदेव को मोहित करने वाले श्यामसुन्दर मन्द- मन्द मुस्कुराते खड़े थे लखतहिं सखी! हाय किरिकिरि सों, नैनन आन परे अरी सखी! देखते ही वे मेरी आँखों में किरकिरी के समान पड़ गये अब 'कृपालु' कैसेहुँ नहिं निकसत, ऐसे आन अरे || 'श्री कृपालु जी' के शब्दों में वे आँखों में ऐसे अड़ गये कि किसी प्रकार निकाले नहीं निकलते।। ------------------------------------------------------------------------------------------ All rights reserved to ©️‪@JKPIndia‬ #radhakrishna #jagadgurushrikripalujimaharaj #bhakti