हिंदी वर्तनी का मानक रूप | हिंदी वर्तनी का मानकीकरण || Standardization of Hindi Spelling | मर्डे
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हिंदी वर्तनी का मानक रूप || हिंदी वर्तनी का मानकीकरण || Standardization of Hindi Spelling || अशोक मर्डे
हिंदी वर्तनी का मानक रूप / मानकीकरण
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लिखने की रीति को वर्तनी कहते है। सभी भाषाओं की ध्वनियों को सही ढंग से लिप्यंतरित करने के लिए या या लिपि को एकसमान उच्चारण के लिए एकसमान वर्तनी के मानक नियमों की निश्चिती को मानकीकरण कहा जाता है। किसी भी भाषा की ध्वनियों को अपनी भाषा में समान रूप से लिप्यंतरित करने की क्षमता होगी उतनी ही वह भाषा श्रेष्ठ कहलायी जा सकेगी। वर्तनी का संबंध उस भाषा की ध्वनियों के उच्चारण एवं लिखावट से है। एक ही स्वन को प्रकट करने के लिए वर्णों के विविध रूपों का प्रयोग वर्तनी को जटिल बना देता है। इसके लिए वर्णों के मानक बनाने की या मानकीकरण की आवश्यकता होती है।
मानक भाषा ैजंदकंतक स्ंदहनंहम का अर्थ है व्याकरण सम्मत शुद्ध, परिनिष्ठित, परिमार्जित भाषा। मानक भाषा दोषरहित होती है। किसी भी राज्य या देश की मानक भाषा दोष रहित होनी चाहिए। राज्य या देश के सारे व्यवहार मानक भाषा में ही किए जाते है। उसी प्रकार सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मानक भाषा का ही प्रयोग होता है। मानक भाषा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्षेत्र में भी प्रयुक्त होती है। शिक्षित वर्ग द्वारा इस भाषा कों प्रयोग में लाया जाता है। कोई भी भाषा मानकीकरण के तीन चरण होते है उसमें पहला - बोली, दूसरा- भाषा और तीसरा मानक भाषा।
14 सितंबर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को संघराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया । भारतीय संविधान ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत करने के बाद हिंदी की लिपि, वर्तनी और अंकों में एकरूपता तथा एकसमानता लाना जरूरी था । इसके लिए विविध स्तरों पर प्रयास शुरू हुए। 1966 में शिक्षा मंत्रालय ने मानक देवनागरी वर्णमाला प्रकाशित की । देवनागरी के कई वर्ण एक से अधिक रूपों में लिखे जाते थे वे एक ही रूपों में प्रयुक्त किए जाने लगे। उन वर्णो का एक ही मानक रूप निश्चित हुआ। हिंदी भारत की राजभाषा बनने के बाद हिंदी में भारत की सभी प्रादेशिक भाषाओं के ध्वनि चिन्हों को हिंदी में लिखने के लिए नये नये लिपि चिह्नों का समावेश किया गया। 1966 में ही शिक्षा मंत्रालय ने परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला नामक पुस्तिका प्रकाशित की । उसके बाद हिंदी वर्तनी में विविधता को दूर करने के लिए तथा उसमें एकरूपता लाने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने कई प्रकार के प्रयास किए । अनेक भाषाविदों के मतों को जान लिया और 1967 में ंिहंदी वर्तनी का मानकीकरण नामक पुस्तक प्रकाशित की । 1983 में केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में संशोधन कर मानकीकरण की दृष्टि से परिवर्धन कर ‘देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण’ नामक किताब प्रकाशित की। परिवर्धित वर्णमाला में कुछ प्रतीक चिह्न जोडे़ गए है। संविधान की आठवीं अनुसूची में स्वीकृत भारतीय भाषाओं को देवनागरी में भी लिखा जा सकें इसलिए इसलिए समस्त भारतीय भाषाओं की ध्वनियों को देवनागरी में लिपिबद्ध करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे है। देवनागरी लिपि हिंदी के साथ साथ संस्कृत, मराठी, कोंकणी, संताली, बोडो, भोजपुरी, नेपाली आदि भाषाओं की लिपि है।
वर्णमाला का मानक रूप