अज्ञान में आकर्षण क्यों है।।🙏🕉️💞💃
(स्वयंभू) स्वयंदीप्ता
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अज्ञान में आकर्षण क्यों है।।🙏🕉️💞💃
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(स्वयंभू) स्वयंदीप्ता
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अज्ञान में आकर्षण इसलिए है क्योंकि अज्ञान हमें परिचित और सुरक्षित लगता है।
जो हम वर्षों से मानते आए हैं वही हमें सत्य जैसा लगता है।
अहंकार, इच्छाएँ, मान्यताएँ और पहचान मन को एक परिचित संसार देती हैं। इसलिए उन्हें छोड़ना मन को अपने अस्तित्व को छोड़ने जैसा लगता है।
ज्ञान में कुछ नया पाने की बात नहीं है बल्कि जो असत्य मान लिया है उसे देखने और छोड़ने की बात है।
इसीलिए अज्ञान आकर्षक लगता है और सत्य की ओर जाना कभी-कभी कठिन।
लेकिन जब सत्य की झलक मिलती है तो धीरे-धीरे समझ आता है कि आकर्षण अज्ञान में नहीं था, आकर्षण अपनी ही बनाई हुई पहचान में था।
हमने अपने बारे में बहुत कुछ मान लिया है ।।
मैं ऐसा हूँ, मेरी ऐसी पहचान है, मुझे ऐसा ही होना चाहिए, लोग मुझे ऐसे ही देखें।
धीरे-धीरे यही मान्यताएँ हमारी पहचान बन जाती हैं और फिर उन्हें छोड़ना कठिन लगता है।
जैसे किसी व्यक्ति ने वर्षों से एक पुराना कपड़ा पहन रखा हो। कपड़ा पुराना है लेकिन वह उससे इतना परिचित हो गया है कि उसे लगता है यही उसका अपना स्वरूप है। नया वस्त्र मिलने पर भी वह पुराने को छोड़ना नहीं चाहता।
इसी तरह अज्ञान में भी हमारी मान्यताएँ पुरानी और परिचित होती हैं। उनका आकर्षण इसलिए नहीं है कि उनमें सत्य है बल्कि इसलिए है कि हम उनसे अपनी पहचान बना चुके हैं।
ज्ञान उस पहचान को छीनता नहीं है। बस यह दिखाता है कि
जिसे मैं अपना स्वरूप समझ रहा था वह केवल एक बनाई हुई पहचान थी।
पहचान छूटती है तो कुछ नया नहीं मिलता
बस जो वास्तव में है वही स्पष्ट हो जाता है।