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Ganesh utsav kyo manate hai ||

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Ganesh utsav kyo manate hai ||

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Ganesh utsav kyo manate hai सोचिए… एक ऐसा त्योहार, जिसमें भगवान गणेश की मूर्ति को बड़े प्रेम से घर लाया जाता है, कई दिनों तक पूजा की जाती है, ढोल-ताशे बजते हैं… और फिर उसी भगवान की मूर्ति को पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों? क्या गणेश उत्सव सिर्फ भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है? या इसके पीछे भारत के इतिहास से जुड़ी एक ऐसी कहानी भी है, जिसने अंग्रेजों के शासन के दौरान लाखों लोगों को एक साथ खड़ा कर दिया था? इस कहानी में एक तरफ भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पौराणिक कथा है… तो दूसरी तरफ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और आजादी के दौर का भारत। और जब इन दोनों कहानियों को जोड़कर देखते हैं, तो गणेश उत्सव का असली अर्थ कहीं ज्यादा गहरा नजर आता है। गणेश उत्सव की कहानी समझने के लिए सबसे पहले हमें उस पौराणिक कथा में जाना होगा, जिसे भगवान गणेश के जन्म से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि एक दिन माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण डाल दिए। यह बालक गणेश था। पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, तब तक किसी को अंदर न आने दिया जाए। कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे। लेकिन गणेश उन्हें पहचानते नहीं थे। उन्होंने शिव को अंदर जाने से रोक दिया। बात बढ़ी और संघर्ष के दौरान भगवान शिव ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया। जब माता पार्वती को इसका पता चला, तो उनका क्रोध भयंकर हो उठा। उन्होंने संसार को नष्ट करने तक की चेतावनी दे दी। तब भगवान शिव ने गणेश को नया जीवन देने का वचन दिया और हाथी का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया। यही कारण है कि गणेश जी को गजानन कहा जाता है। लेकिन गणेश जी सिर्फ हाथी के सिर वाले देवता नहीं हैं। हिंदू परंपरा में उन्हें बुद्धि, विवेक, शुभ शुरुआत और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। इसलिए किसी भी शुभ काम की शुरुआत गणेश जी की पूजा से करने की परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा है। हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है और इसे भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में माना जाता है। लेकिन अब कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है। अगर गणेश जी की पूजा सदियों से होती आ रही थी, तो आज जैसा विशाल सार्वजनिक गणेश उत्सव आखिर कैसे शुरू हुआ? इसके लिए हमें जाना होगा उन्नीसवीं सदी के भारत में। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। लोगों में असंतोष था, लेकिन आम जनता को बड़ी संख्या में एक साथ इकट्ठा करना आसान नहीं था। इसी दौर में महाराष्ट्र के पुणे में सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव मनाने की परंपरा को नया रूप मिलने लगा। इस इतिहास में भाऊसाहेब रंगारी का नाम महत्वपूर्ण है। 1892 में उन्होंने पुणे में सार्वजनिक गणपति उत्सव आयोजित किया था। इसके अगले वर्ष लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेश उत्सव को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया। तिलक समझते थे कि भारत के लोगों को एक ऐसे मंच की जरूरत है, जहां वे एक साथ आ सकें। और गणेश उत्सव इसके लिए एक शक्तिशाली माध्यम बन सकता था। गणेश जी किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं थे। इसलिए उनके नाम पर होने वाले सार्वजनिक आयोजन में अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ आने लगे। पंडाल बनने लगे। आरती और भजन होने लगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम होने लगे। और इसी भीड़ के बीच समाज और देश की स्थिति पर चर्चा होने लगी। यानी जिस उत्सव का केंद्र भगवान गणेश थे, वह धीरे-धीरे सामाजिक एकता और जनजागरण का माध्यम भी बन गया। यही वह दौर था, जब गणेश उत्सव ने धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर समाज को जोड़ने में भूमिका निभाई। लेकिन इस पूरे उत्सव का एक हिस्सा आज भी सबसे ज्यादा भावुक करता है—गणेश विसर्जन। जिस मूर्ति को हम घर लाते हैं, उसे सजाते हैं, उसकी आरती करते हैं, उसे मोदक चढ़ाते हैं… आखिर में उसी मूर्ति को विदा कर देते हैं। क्यों? इसके पीछे एक गहरा प्रतीक माना जाता है। मूर्ति मिट्टी से बनती है और अंत में उसी प्रकृति में वापस मिल जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि संसार में कोई भी रूप हमेशा के लिए स्थायी नहीं है। आना और जाना जीवन का हिस्सा है। इसीलिए विसर्जन सिर्फ भगवान गणेश को विदा करना नहीं है। यह एक तरह से यह स्वीकार करना भी है कि जिसे हमने कुछ दिनों के लिए अपने घर में अपनाया, उसे एक दिन वापस उसी प्रकृति में लौटना होगा। और शायद इसलिए विसर्जन के समय लोगों की आंखों में खुशी के साथ-साथ भावुकता भी दिखाई देती है। ढोल बजते हैं… लोग नाचते हैं… और हजारों आवाजें एक साथ गूंजती हैं— “गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ।” यह सिर्फ एक नारा नहीं है। यह उस विश्वास की आवाज है कि बप्पा फिर आएंगे। आज गणेश उत्सव महाराष्ट्र से निकलकर भारत के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में विशाल गणेश पंडाल और सार्वजनिक आयोजन इसकी पहचान बन चुके हैं। कई जगह इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक सेवा और जनजागरूकता के अभियान भी चलाए जाते हैं। लेकिन इस पूरे उत्सव की सबसे खास बात शायद यही है कि इसमें धर्म और इतिहास दोनों की कहानियां एक साथ दिखाई देती हैं। एक तरफ वह गणेश हैं, जिन्हें माता पार्वती ने बनाया था। वही गणेश, जिन्हें भगवान शिव ने नया जीवन दिया। वही गणेश, जिन्हें आज हम बुद्धि और शुभ शुरुआत का देवता मानते हैं। और दूसरी तरफ वही गणेश उत्सव है, जिसे लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजी शासन के दौर में लोगों को एक मंच पर लाने के लिए बड़े स्तर पर लोकप्रिय बनाया। इसलिए अगली बार जब आपके घर गणपति आएं, तो सिर्फ उनकी मूर्ति को मत देखिएगा। उसके पीछे छिपी पूरी कहानी को याद कीजिएगा। यह कहानी है आस्था की। यह कहानी है नई शुरुआत की। यह कहानी है समाज को एक साथ लाने की। और यह कहानी है उस विदाई की, जो हमें सिखाती है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत जरूर होती है।