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कुंभलगढ़ के प्राचीन ३०० जैन जिन-मंदिरों का भव्य इतिहास

Jain Aangi

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कुंभलगढ़ के प्राचीन ३०० जैन जिन-मंदिरों का भव्य इतिहास

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ऐतिहासिक विरासत, कुम्भलगढ़ किला..। गर्व लेने जैसी कल, किन्तु आज का मत पूछो । भव्य भारत में राजस्थान के ऐतिहासिक क्षितिज पर मेवाड़ की वीरता, शूरवीरता, त्याग भक्ति एवं बलिदान की भावना सुवर्ण पृष्ठ पर अंकित होकर अनेक लोगों के मन में शौर्य एवं भक्ति का अनूठा आदर्श प्रकट करती है। उसी मेवाड़ की धरती पर प्राचीनता की बेमिसाल अस्मिता को धारण किए अनेक अद्भुत जिन मंदिर विद्यमान है जिसमें श्री कुंभलगढ़ किला स्थित जिन मंदिर की भव्यता तो देखने लायक है । एकमात्र कुंभलगढ़ किले में 300 से अधिक जिन मंदिर विद्यमान थे। आज काल के प्रभाव में अनेक मंदिर विध्वंस हो गए किन्तु जो बचे है वे भी बेनमून है। श्री पार्श्वनाथ प्रभु का जिन मंदिर , 52 जिनालय, पितलिया शाह जिनमंदिर, घोलेराव समूह जैन मंदिर इत्यादि सर्वत्र किले में चारों ओर फैले हुए दृष्टि पथ पर आते हैं। 30 से 40 जिन मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में तो कुछ अच्छी अवस्था में आज भी विद्यमान है। कुछ प्रतिमाजी मंदिर में मौजूद है तो शेष प्रतिमाजी पुरातत्व खाते में सुरक्षित बिना पूजन के यूं ही पड़ी होगी। कुंभलगढ़ किले की गहराई में अतीत के गवाक्ष से देखेंगे तो भव्य इतिहास ज्ञात होगा। सम्राट सम्प्रति ने भारतीय संस्कृति और अहिंसा की जीवन शैली को प्रचारित एवं प्रसारित करने हेतु विजय यात्रा की थी । सम्राट ने अपने महल से आर्यसुहस्ति सूरीश्वरजी महाराज को देखा , स्मृति अतीत को खोजने लगी ऐसे मुनिराज को मैंने कहीं देखा है, जातिस्मरण ज्ञान हुआ। पूर्व भव स्पष्ट दिखाई देने लगा। भूख के दुख से त्रस्त होकर दीक्षा जीवन का स्वीकार और अंतिम समय में साधु बनकर समाधि मृत्यु की प्राप्ति यह सब याद आते ही दीक्षा जीवन प्रदान करने वाले आर्यसुहस्ति सूरिजी के चरणों में अपना विशाल साम्राज्य समर्पित करने संप्रति लालायित बना। साधु, साम्राज्य को क्या करें । धर्म राह पर चलने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप जगह जगह जिन मंदिरो की रचना और जिनप्रतिमाओ का सर्जन प्रारंभ हुआ। सवा लाख जिन मंदिर एवं सवा करोड़ जिन प्रतिमा बनवाकर गुरु तथा माता की भावना साकार की थी ।आज मात्र स्मृति रूप गिने चुने जिनमंदिर एवं प्रतिमा जी अवशेष रूप में प्राप्त होते हैं । जैन मतावलम्बी सम्राट सम्प्रति ने कुंभलगढ़ किला बनवाया था। प्राचीन काल में कुंभलगढ़ किले पर 5000 से ज्यादा लोग रहते थे। यह किला जीर्ण होने पर 15वी शताब्दी मे मेवाड़ में 84 किले बनाने वाले राणा कुंभा ने इसी किले पर विशाल किला बनवाया। आज आप कुंभलगढ़ किले पर जाओ तो संप्रति के जीवन के बारे में विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। समाज ने संप्रति के इतिहास की ऐसी घोर उपेक्षा की है कि उसके विराट कार्य की परिपूर्ण पहचान नहीं मिलती है। महाराजा सम्प्रति ने यही 36 किलोमीटर की दीवार बनवाई थी। राज्य रक्षण हेतु इतनी बड़ी दीवार चुनवाई हो यह घटना विरल होगी। इतिहास सुन सकते हैं, जान सकते हैं, किंतु भूल नहीं सकते हैं। यहां के जिन मंदिरों की विधर्मियों ने विचित्र हालत कर दी । आक्रमणखोरों ने काफी प्रभु प्रतिमाजी नष्ट-विनष्ट कर दी, किंतु स्थापत्य रचना को जस की तस रहने दी। मंदिर के भूतल में श्वेतांबर मूर्तियां प्राप्त होती है ।कुंभलगढ़ के इन जीर्ण मंदिरों को देखते आज भी उत्कृष्ट जाहोजलाली से हरा-भरा इतिहास हमारी आंखों के सामने आ जाता है। यहां के मंदिरों की एक अद्भुत विशेषता यह है, यहां एक एक जैन मंदिर की स्थापत्य रचना, कद, दिखावा, दूसरे जिन मंदिर से बिल्कुल भिन्न है । किसी मंदिर की ऊंचाई देखने जैसी, तो कोई मंदिर छोटी देवरी जैसा, तो कोई 52 शिखरी विशाल जिन मंदिर विद्यमान है। नक्काशी का भी वैविध्य देखने को मिलता है। इन मंदिरो के द्वार, छत, स्तम्भ और गोखले पर भी सुंदर शिल्प कार्य देखने को मिलता है। यह तीर्थ पुनः जीवंत करना अब हमारी जिम्मेदारी है । आज हमें यही कहना है, उत्सव महोत्सव में डूबे समाज को ऐसे तीर्थ की रौनक एवं उत्थान हेतु अवश्य आगे आकर कार्य करना चाहिए। ये सारे जिन मंदिर हमें आज भी आवाज दे रहे हैं.. आवाज दे रहे हैं..आवाज दे रहे हैं..।