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कुंडलिनी शक्ती का ज्ञान और विज्ञान - भाग ११- योगिराज मनोहर हरकरे

Vaidik Vishwa

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कुंडलिनी शक्ती का ज्ञान और विज्ञान - भाग ११- योगिराज मनोहर हरकरे

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Vaidik Vishwa
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अध्यात्म की आवश्यकता अपने आप में स्थित दिव्य अस्तित्व को पहचानना ही अध्यात्म है। अध्य + आत्म इन दो शब्दों के योग से अध्यात्म शब्द बना है। परंतु अध्यात्म की आवश्यकता ही क्या है ? केवल अध्यात्मिक कल्पना अथवा जीवन यापन कर मानव को लाभ क्या है? प्रत्येक वस्तु अथवा अस्तित्व का मूल कारण क्या है इस पर विचार करना बुद्धिमान मानव का धर्म है। पुनः प्रश्न उपस्थित होगा कि इस प्रकार मूल कारण पर शोध करने की आवश्यकता ही क्या है ? आज का वैज्ञानिक उत्क्रांत जगत इन्हीं गूद विषयों के शोध का प्रतिफल है। यदि मानव में उपलब्ध अवस्थाओं के आगे जाने की वृत्ति न होती तो इतने संशोधन कर मानव जीवन समृद्ध एवं तृप्त न होता। किसी उपकरण या यंत्र का आविष्कार कर उससे ही संतुष्ट न रहकर उसमें संशोधन किये जाते हैं तब अधिक उपयुक्त यंत्र खोज निकालने की प्रवृत्ति संशोधक में दिखाई देती है। उसकी खोज का लाभ समाज के उपभोग करने वाले सभी घटक लेते हैं। उस उपकरण का उपयोग करने की एक विधि व अनुशासन रहता है, जिसके अनुसार उपकरण सुयोग्य तरीके से उपयोग में लिया जाता है। अन्तरिक्ष में प्रवास करने वाले अन्तरिक्ष यात्री को तो अधिक संयम नियम की आवश्यकता रहती है अन्यथा वे चंद्र पर अथवा अन्य ग्रहों पर पहुँच ही न सकेंगे। विज्ञान के परे जो मूल अवस्था है उसके लिए अध्यात्म की आवश्यकता अनिवार्य है। साधारण जीवन के लिए यदि संयम नियम आवश्यक है, तो चिरस्थायी सुख देने वाले अध्यात्म के लिए संयम नियम क्यों न रखे जावें ? उत्क्रांति के लिए संयम अनिवार्य रहता है। उत्क्रांत जीव अपनी पुरानी आदतों को त्याग उच्च उत्क्रांत आदतों का अभ्यस्त हो जाता है। इसी कारण उत्क्रांत जीवन संभव हुआ है। इसी प्रकार जिन्हें मानव का अधिक उत्क्रांत जीवन आवश्यक लगता हो, ऐसी विचारधारा के व्यक्ति को अध्यात्म की आवश्यकता रहती है। उत्क्रांत एवं सुसंस्कृत जीवन के लिए आवश्यक' संयमी जीवन के प्रति आज के समाज में रुचि नहीं है। निसर्ग में पशुओं के स्वच्छंद जीवन उनके सामने रहने से उसी प्रकार के स्वच्छंद जीवन का अनुसरण करने की दृष्टि से प्रकृति में पशु जीवन का उदाहरण देते हैं और उसी स्वच्छंद पशु जीवन को सुखी मानते हैं। उन्हें लग्न संस्था सामाजिक नियमों के बंधन में आस्था नहीं रहती। उस प्रकार बंधनों के कारण ही सच्चे सुख एवं उपभोग नहीं मिल सकते, इस प्रकार की उनकी धारणा रहती है। उनकी कल्पनानुसार वे पूछते हैं कि जिस समाज ने उनके लिए कुछ नहीं किया उस समाज के लिए उन्हें संयम एवं त्याग क्यों करना चाहिए ? नैसर्गिक प्रकृतिजन्य लैंगिक आकर्षण के आवेश में वे नई संतति को जन्म देते हैं और प्राकृतिक वात्सल्य भावना के कारण उसका भरणपोषण करते हैं। ऐसा करने में वे आगे की पीढ़ी पर कोई उपकार नहीं करते। नयी पीढ़ी अपने उदरपोषण के लिए अपने बुद्धिसामर्थ्य द्वारा कष्ट कर अपनी जीवन यात्रा सुख से चला सकती हैं। सुयोग्य व्यक्ति ही अपने जीवन संघर्ष में जीवित रह सकता है। इसीलिए जीवन रहने के लिए तथाकथित सुसंस्कृत आचार विचार एवं संयम नियम से रहने की उन्हें आवश्यकता नहीं लगती। इसके विपरीत यह विचारधारा जीवन को दुःखी कर व्यर्थ बंधनों में जकड़ती है, ऐसा उनका मत है। ऐसी स्वतंत्र विचारधारा के लोग अध्यात्म अथवा सामाजिक नीति इन दोनों बातों को अपना वैयक्तिक बड़प्पन दिखाने हेतु प्रयुक्त करते हैं। तथा अन्य लोगों को गुमराह कर मूर्ख बनाने की चाल चलते हैं, इस प्रकार के लोगों को धर्म या अध्यात्म की चिन्ता नहीं रहती। इस प्रकार के विचारों को वे अफीम का नशा मानते हैं। इन लोगों के विचार कुछ अंशों में ही सही रहते हैं। जिस प्रकार बंदर झाड़ पर ही रहते हैं, उसी प्रकार ये लोग सामाजिक भौगोलिक दृष्टि से मान्य खुले प्रचलित रीतिरिवाजों को ही धर्म मानने वाले अनेक लोगों को येनकेन प्रकारेण इकट्ठा कर उसी में निरर्थक धार्मिक स्वाभिमान मानते हैं। ऐसे लोगों की आज कमी नहीं है। धर्मपंथ की स्थापना आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए होती है, संख्या बल का अहंकार दिखाने के लिए नहीं। दारिद्रय, अज्ञानता, एवं आत्मविस्मृति जैसे मानव जीवन को घातक आचार विचारों की उन्हें परवाह नहीं रहती। वे अपना बड़प्पन दिखाने के लिए जो मन में आता है सो करते हैं, परंतु स्वतः का जीवन उस आदर्श से वंचित रखते हैं। इन्हीं पाखंड़ी धोखेबाजों के जीवन नई विचारधारा के व्यक्तियों के सामने आने से वे अध्यात्म अथवा सुसंस्कारी जीवन को अहंकारी मानते हैं। इसी कारण नई विचारधारा के लोग धर्म अथवा अध्यात्म के विषय में विचार करने को तैयार नहीं रहते। दरिद्रता में पड़े अज्ञानी लोगों की ये अहंकारी लोग परवाह नहीं करते, ऐसा नई विचारधारा वाले समझते हैं। यही कारण है कि नई विचारधारा वाले व्यक्ति सामाजिक नीति नियम अथवा धर्म अध्यात्म की ओर पूर्णतः उदासीन रहते हैं। #yoga #kundalini #yog