भारत का वो द्वीप, जिसे हड़पने आई इंडोनेशिया की नौसेना! #indiannavy #maritimehistory #indopacific
PracheenGyan
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भारत का वो द्वीप, जिसे हड़पने आई इंडोनेशिया की नौसेना! #indiannavy #maritimehistory #indopacific
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भारत का वो आखिरी द्वीप, जिसे हड़पने आई थी इंडोनेशिया की पूरी नौसेना! #lastislandofsurvival #indiannavy #maritimehistory #geopolitics #indopacific #truestory #unseenhistory #wartimestories #navymotivation #naval #confrontation #island #frontier #militaryhistory #untoldtruth #geopoliticaltensions #indianoceanregion #strategicimportance #documentaryfilm
सितंबर 1965। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर की वादियों और पंजाब के मैदानों में भीषण युद्ध चल रहा था। भारत की पूरी सेना पश्चिमी मोर्चे पर व्यस्त थी। लेकिन इसी बीच, भारत से हजारों किलोमीटर दूर, हिंद महासागर के सुदूर दक्षिणी कोने में एक और खूनी चक्रव्यूह रचा जा रहा था। इंडोनेशिया के तत्कालीन तानाशाह राष्ट्रपति सुकर्णो ने खुलेआम पाकिस्तान का साथ देने का ऐलान कर दिया था। उनका इरादा कश्मीर नहीं, बल्कि भारत का सबसे दक्षिणी हिस्सा—अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को भारत से छीनना था।
इंडोनेशियाई नौसेना उस समय एशिया की सबसे आधुनिक और खतरनाक नौसेनाओं में से एक थी, जिसे सोवियत संघ (रूस) ने घातक सबमरीन और 'क्रूजर' दिए थे। इंडोनेशिया का प्लान बिल्कुल साफ था—पिग्मी पॉइंट पर अचानक अपने मरीन कमांडो उतारना, वहां अपना झंडा फहराना और उस द्वीप का नाम बदलकर 'सुकर्णो द्वीप' रख देना। अंडमान में उस वक्त भारत की कोई बड़ी सैन्य मौजूदगी नहीं थी। भारत का वो आखिरी कोना पूरी तरह लावारिस था और इंडोनेशिया के युद्धपोत उसकी सरहद के बिल्कुल करीब पहुँच चुके थे।
दोस्तों, इस घटना को इतिहास की किताबों से पूरी तरह गायब कर दिया गया, लेकिन यह भारत के अस्तित्व पर आया एक बहुत बड़ा संकट था। 1965 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बेहद करीबी दोस्त बन चुके थे। सुकर्णो ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपने दो युद्धपोत और दो सबमरीन सीधे कराची भेज दी थीं।
लेकिन उनका असली मास्टरस्ट्रोक था—भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा करना, क्योंकि यह इलाका इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से महज 150 किलोमीटर दूर था।
भारतीय नौसेना के युद्धपोत बिना अपनी लाइटें जलाए, पूरी तरह 'रेдио साइलेंस' बनाए रखते हुए अंडमान के चारों तरफ फैल गए। INS विक्रांत के लड़ाकू विमानों को चौबीसों घंटे आसमान में गश्त लगाने का आदेश दिया गया। पायलटों को साफ निर्देश थे—"अगर कोई भी इंडोनेशियाई जहाज भारतीय समुद्री सीमा में एक इंच भी दाखिल हो, तो बिना चेतावनी के उसे समंदर की तलहटी में सुला दो।"
सितंबर के मध्य की एक खौफनाक रात। पिग्मी पॉइंट से कुछ ही नॉटिकल मील दूर, भारतीय नौसेना के जहाजों का सामना सीधे इंडोनेशियाई नेवल फ्लीट से हो गया। समंदर में भयंकर तूफान था, लहरें जहाजों के डेक से टकरा रही थीं।
भारतीय जहाजों के गनर अपनी तोपों का रुख इंडोनेशियाई जहाजों की तरफ करके ट्रिगर पर उंगली दबाए बैठे थे।
भारत ने बिना एक भी गोली चलाए, सिर्फ अपनी रणनीतिक ताकत और फौलादी अनुशासन के दम पर अपने सबसे आखिरी द्वीप को विदेशी कब्जे में जाने से बचा लिया। इस घटना के कुछ ही समय बाद, इंडोनेशिया में तख्तापलट हो गया और राष्ट्रपति सुकर्णो को सत्ता से बेदखल कर दिया गया, जिसके बाद भारत और इंडोनेशिया के रिश्ते दोबारा सामान्य हो सके। बाद में इसी 'पिग्मी पॉइंट' का नाम बदलकर हमारी पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर 'इंदिरा पॉइंट' रख दिया गया।
"ऑपरेशन डेथ रीफ" भारतीय नौसेना के इतिहास का वो खामोश पन्ना है जो हमें सिखाता है कि युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि समंदर के उन सुदूर कोनों में भी लड़े जाते हैं जहाँ आम इंसान की नजर भी नहीं पहुँचती। हमारे नाविकों और पायलटों की उस रात की मुस्तैदी की वजह से ही आज इंदिरा पॉइंट भारत का हिस्सा है और हिंद महासागर में भारत की संप्रभुता का प्रतीक बना हुआ है।
आज जब भी हम भारत के नक्शे के सबसे आखिरी बिंदु को देखते हैं, तो हमें हमारी नौसेना के उस अदृश्य शौर्य को जरूर नमन करना चाहिए।