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रामलीला रैली के बाद अब क्या? श्रवण गर्ग की खरी बात #harkara

Harkara हरकारा

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रामलीला रैली के बाद अब क्या? श्रवण गर्ग की खरी बात #harkara

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Harkara हरकारा
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रामलीला मैदान पर विपक्ष की ऐतिहासिक रैली हुई. भीड़ उमड़ी. सब कुछ शांति से निपट गया. पर सवाल यह है कि इसके बाद क्या? वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग 25 जून 1975 को इसी मैदान पर जेपी की सभा में मौजूद थे. उस रात इमरजेंसी लगी थी. वे कहते हैं कि 52 साल में उन्होंने विपक्ष की इतनी बड़ी रैली नहीं देखी. फिर भी उनका टेक-होम "कुछ नहीं" है. इस बातचीत में: • रैली का उद्देश्य साफ़ क्यों नहीं था? • मॉक इंपीचमेंट और रामलीला के भाषणों में फ़र्क़ क्या था? • शांति आयोजकों की कामयाबी थी या सरकार की रणनीति? • 20 जुलाई के जंतर-मंतर से सरकार ने क्या सीखा? • राहुल गांधी को अकेले नहीं, सामूहिक नेतृत्व क्यों चाहिए? • आंदोलन को दिल्ली से निकालकर ज़िलों तक कैसे ले जाएँ? • गांधी की "मिलिटेंट अहिंसा" आज क्यों ज़रूरी है? मेज़बान: निधीश त्यागी मेहमान: श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा. सब्सक्राइब करें: @HarkaraRozana पढ़ें: harkaraonline.com न्यूज़लेटर: harkara.substack.com ⏱ टाइमस्टैम्प 00:00 परिचय 00:58 1975 की जेपी सभा की याद 03:18 "कितने आदमी थे?" गोदी मीडिया पर चुटकी 04:27 कांग्रेस का सात सूत्री मूल्यांकन 07:23 रैली का उद्देश्य क्या था? 11:02 मॉक इंपीचमेंट बनाम रामलीला 14:07 "कोई रिटर्न गिफ़्ट नहीं मिला" 15:16 शांति किसकी रणनीति थी? 19:15 गांधी की मिलिटेंट अहिंसा 21:46 बोफ़ोर्स और इंडियन एक्सप्रेस वाला ट्रिगर 24:31 राहुल का नेतृत्व और सामूहिक नेतृत्व 26:03 मोहल्ले-मोहल्ले रामलीला 27:08 बड़ी पूँजी का खेल 27:50 मिला-जुला आकलन 37:12 निष्कर्ष