|| BANSUR FORT || बानसूर का किला "रहस्यकारी सुरंग और कैदियों के निशान आज भी मिलते है" ||
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राजस्थान के अलवर मे बानसूर का किला जो बना था युद्ध रोकने के लिए।।
आक्रमणों को रोकने में मददगार था किला ::--
किले की भौगोलिक स्थित निराली है। चारों तरफ से पहाडिय़ों के घिरा हुआ है। जिसमें एक माता का मंदिर है जो देवस्थान विभाग के अधीन है। जिसमें दो बावड़ी एक कुआं भी स्थित है। किले के चारों तरफ दुर्ग बने हुए हैं, जो अपनी कला के नमूने को दर्शाता है। पूर्व में किले को देखने के लिए बाहर से लोग आते थे, लेकिन किला आज अपने अतीत की याद दिलाता है।
मत्स्य प्रदेश के इतिहास पर शोध कर रहे किरोड़ीलाल सिंह चौहान के अनुसार दुर्ग की स्थित, विस्तार, आकार एवं बनावट से अनुमान लगाया जाता है कि इस दुर्ग का सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व रहा है। अलवर प्रदेश की सीमा का प्रहरी यह दुर्ग बाहरी आक्रमणों को रोकने मे मददगार था। दुर्ग में प्राप्त अवशेषों से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह दुर्ग सैनिक विश्राम गृह के साथ-साथ सजा प्राप्त कैदियों का बंदी गृह भी रहा है।
जाट शासकों का भी प्रभाव::--
किलेका निर्माण 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर 17 वीं शताब्दी के पूर्वा के मध्य हुआ। 16 वीं शताब्दी में मदन सिंह चौहान जो कि पृथ्वीराज चौहान के वंशज थे, ने मदनपुर -मुंडावर ग्राम बसाया था। उनके 17 पुत्र हुई जो विभिन्न क्षेत्रों में बस गए। इन्हीं के एक वंशज उदयपाल सिंह बानसूर आए। उस समय 42 गांवों की राजधानी थी। संभवत: इन्हीं के द्वारा इस दुर्ग की नींव रखी गई। हालांकि भरतपुर के जाट शासकों का भी उस समय इस क्षेत्र पर काफी प्रभाव रहा है।
प्राचीन किले के संरक्षण के लिए अब तक नहीं हुए कोई प्रयास ::--
क्षेत्रका प्राचीन किला जर्जर है। बुर्ज कई जगह से गिरने की स्थिति में है। किले की यह हालत संरक्षण के अभाव में है। अस्तित्व का संकट होने के बाद भी इस ओर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है।
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