यादगार महफ़िल: Sir Syed Day 2008 | Mushaira: Aziz Quraishi Part 2 - इज़्ज़त-ए-नफ़्स जान से प्यारी
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यादगार महफ़िल: Sir Syed Day 2008 | Mushaira: Aziz Quraishi Part 2 - इज़्ज़त-ए-नफ़्स जान से प्यारी
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Mushaira | Aziz Quraishi (अज़ीज़ क़ुरैशी) Part 2 - Annual Sir Syed Day Mushaira 2008 (USA), Aligarh Alumni Association Washington DC की यादगार महफ़िल।
इस Mushaira में Aziz Quraishi का कलाम सुनिए। संचालक ने इन्हें "बहुत मोहतबर और सीनियर शायर" और पाँच शेरी मजमूओं का ख़ालिक़ बताया। संचालक के मुताबिक़ ये पाकिस्तान में कई ज़िम्मेदार ओहदों पर रहे और रिटायरमेंट के बाद अब वर्जीनिया में रहते हैं। उन्होंने कहा कि इनकी शायरी ज़िंदगी के मनफ़ी और मुस्बत मसाइल का शुऊर रखती है और ज़िंदगी की ख़ूबसूरत क़दरों की तर्जुमान है।
⏱ इस वीडियो में:
0:00 संचालक की तरफ़ से परिचय
0:40 वक़्त का है ये तक़ाज़ा के तू दाना हो जा
1:18 दयारे ग़ैर में जीने की जुस्तजू कीजिए
1:49 गुलों की बात ख़ारों तक न पहुँचे
2:41 चलो हम चल के वो मंज़र दोबारा देख लेते हैं
3:16 गो मैं कुछ भी न सही फिर भी नुमायाँ हूँ मैं
3:50 इज़्ज़त-ए-नफ़्स मेरी जान से है प्यारी मुझको
4:41 झोंके ठंडी हवा के चलते हैं
5:35 ग़ज़ल के पाँच शेर: मुश्किल है बहुत दिल से अगर दिल नहीं मिलता
7:28 आख़िर में एक हल्का-फुल्का शेर
📜 चुनिंदा अशआर:
न इंतक़ाम किसी से न इख़्तिलाफ़ कोई
यहाँ तो सिर्फ़ मोहब्बत की गुफ़्तगू कीजिए
सुकून हमको मुयस्सर आ गया है
मगर ये बात यारों तक न पहुँचे
गो मैं कुछ भी न सही फिर भी नुमायाँ हूँ मैं
अपने जज़्बात और ख़्यालात का उन्वाँ हूँ मैं
इज़्ज़त-ए-नफ़्स मेरी जान से है प्यारी मुझको
मुझ में इंसान की अज़मत है कि इंसाँ हूँ मैं
हम सर हमेशा उठा के चलते हैं
फिर भी सबसे निभा के चलते हैं
ये किससे कहूँ रंग-ए-सुख़न मीर है जैसा
होशियार सभी हैं, कोई ग़ाफ़िल नहीं
पूरा Mushaira वीडियो ज़रूर देखें। आपको इनमें से कौन-सा शेर सबसे ज़्यादा पसंद आया, कमेंट में लिखिए। ऐसी यादगार महफ़िलों और Urdu Shayari के लिए चैनल को Subscribe करें।
CD'S AVAILABLE AT:-
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OPP STATE BANK, AMINABAD, LUCKNOW U.P
PH 9839128165, 9335918233
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