उस पुतले पर मेरे दादाजी का कुर्ता टंगा था | गांव की भूतिया कहानी | Parchaee Lok
Parchaee Lok
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उस पुतले पर मेरे दादाजी का कुर्ता टंगा था | गांव की भूतिया कहानी | Parchaee Lok
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जो दिखता नहीं, वो होता है.
हमारे गांव के खेत में एक पुतला खड़ा है, पर वो फसल की रखवाली के लिए नहीं है. उस पर गांव के गायब हुए लोगों के कपड़े टंगे हैं, और रोज़ सुबह वो पिछली रात से थोड़ा आगे मिलता है, गांव की तरफ.
रोहित बीस साल बाद अपने गांव लौटता है. दादाजी बीस साल पहले गायब हुए थे, और उनका कुर्ता आज भी उस पुतले पर टंगा है. पहली ही रात कैमरे में चालीस सेकंड गायब हो जाते हैं. उसके बाद जो हुआ, उसकी कीमत रोहित के अपने परिवार को चुकानी पड़ी.
यह कहानी अंत तक सुनिए. पहली बार सुन रहे हैं तो रात को अकेले मत सुनिए.
आपसे एक सवाल.
अगर रात को आपके पीछे से आपके किसी अपने की आवाज़ आए, और आपके साथ वाला वही इंसान चुप खड़ा हो, तो क्या आप पलटकर देखेंगे? कमेंट या लाइव चैट में बताइए. और ये भी बताइए कि आपके गांव में कोई ऐसी रीत या रात की मनाही थी जो आज तक समझ नहीं आई?
सबसे दिलचस्प जवाब हम अगली कहानी की शुरुआत में पढ़ेंगे.
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नोट: यह एक काल्पनिक कहानी है. इसमें दिखाए गए गांव, पात्र और घटनाएं पूरी तरह काल्पनिक हैं और किसी असली जगह, व्यक्ति या समुदाय से इनका कोई संबंध नहीं है.
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