कश्मीर में आग लगाने की साजिश शुरू?विधानसभा में पेश किया स्वायत्ता प्रस्ताव?शरई अदालत तलाक कानूनी नही
Dhirendra Pundir News Point
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कश्मीर में आग लगाने की साजिश शुरू?विधानसभा में पेश किया स्वायत्ता प्रस्ताव?शरई अदालत तलाक कानूनी नही
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कल श्रीनगर में राज्य माँगा गया। कागज़ पर 2000 वाला वजीर-ए-आजम भी चिपक गया।
उसी पखवाड़े बिलासपुर ने कहा — शरई अदालत तलाक नहीं लिख सकती।
दो खबरें। एक बीमारी। संविधान के बाहर कुर्सी का दावा।
पहले कश्मीर।
25 सितंबर 2026 को उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में पूर्ण राज्य का प्रस्ताव रखा। शीर्षक साफ। अंदर की स्याही — “26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 के अतिरिक्त”। 2000 वाला प्रस्ताव पूर्व-1953 माँगता था: वजीर-ए-आजम, सदर-ए-रियासत, केंद्र के पास सिर्फ़ रक्षा-विदेश-संचार। उमर कहते हैं स्वायत्तता पर वोट नहीं। पार्टी का नेता लिखता है — एजेंडा कभी नहीं भूले। जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय शासन आठ दौर + UT का लंबा अध्याय, कुल करीब 13 वर्ष। परिवार के गठबंधन कांग्रेस से एनडीए तक घूमे, नारा घाटी के लिए रहा, कुर्सी दिल्ली की।
फिर छत्तीसगढ़।
उसी हाईकोर्ट, उसी जज ने दो हफ्ते में दो बार कहा — दारुल कज़ा कानून की अदालत नहीं। 7–8 सितंबर को रायपुर इदारा-ए-शरिया का 2022 वाला हुक्म रद्द। 25 सितंबर को उज़मा बानो के मामले में तलाक पर रोक, जोड़ा अभी विवाहित। यह नई लकीर नहीं। सुप्रीम कोर्ट 2014 (विश्व लोचन मदान) और 2025 में कह चुका — फतवा राय है, डिक्री नहीं, जबरदस्ती अवैध। प्रवर्तन पुलिस से नहीं, बहिष्कार से चलता है।
पंचायत राज्य की होती है। यह मंच समुदाय का है, “कोर्ट” शब्द धोखा है।
देखिए पूरा विश्लेषण — प्रस्तावों की ज़ंजीर, फैसलों की तुलना-पट्टी, और वो सवाल जो दोनों खबरें एक साथ पूछती हैं:
संविधान के बाहर फैसला कौन सुनाए — परिवार, या फतवा?
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