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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 12 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

AnandVrindavan

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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 12 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 12 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |    • माण्डूक्यकारिका - अद्वैत  प्रकरण - 12  | प...   परम पूज्य महाराजश्री द्वारा प्रस्तुत इस प्रवचन (माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण) के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: मुख्य बिंदु - 🔸1. आत्मा और जगत की अनन्यता (01:05 - 02:05): आत्मा, जीव, जगत और ईश्वर केवल शब्द के स्तर पर अलग हैं, वास्तव में ये सब एक ही हैं। ये सब 'स्व' या 'आत्मा' से अलग नहीं हैं। 🔸2. ज्ञान का महत्व (05:41 - 06:16): आत्म-ब्रह्म की एकता का ज्ञान स्वयं ही प्राप्त करना होता है; यह कार्य किसी और के द्वारा नहीं कराया जा सकता, जैसे भूख लगने पर स्वयं खाना पड़ता है। 🔸3. भेद दर्शन की निंदा और एकत्व की प्रशंसा (06:33 - 07:15): शास्त्रों में नानात्व (भेद) दर्शन की निंदा की गई है और एकत्व दर्शन को ग्राह्य बताया गया है। 🔸 4 .विलक्षणता का अर्थ (11:15 - 14:13): वेदांत में 'भेद' का अर्थ वस्तुओं में विविधता है, न कि सत्ता में भेद। जैसे सोने के गहने अलग-अलग आकार के होते हुए भी तत्व रूप में स्वर्ण ही हैं, वैसे ही यह संसार ब्रह्म ही है। 🔸5 . राग-द्वेष की निवृत्ति (19:31 - 20:45): जब साधक को यह अनुभव हो जाता है कि सब कुछ आत्मा ही है, तो बुद्धि से राग और द्वेष मिट जाते हैं। 🔸6. परम ब्रह्म का अनुभव (33:05 - 35:05): जो पुरुष 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव कर लेता है, वह आत्म-रति और आत्म-क्रीडा में स्थित हो जाता है। उसे किसी बाह्य आनंद की आवश्यकता नहीं रहती। 🔸7. मन और विषयों का त्याग (50:12 - 53:36): मन को विषयों से अलग करने के बजाय, उस 'अहं' का त्याग करना आवश्यक है जो मन और विषय दोनों का आश्रय है। जब जीव स्वयं को आत्मा के रूप में स्थित कर लेता है, तो मन और विषय स्वयं अपनी सत्ता खो देते हैं। #swamiakhandanandsaraswati #mandukyaadvaitprakaran #anandprastuti #satsang #anandvrindavanashram