डिग्गीपुरी राजा की कथा || Diggipuri Raja ki ketha || Hari kirtan party Gerota || हरि कीर्तन दंगल
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कल्याण जी का इतिहास और कथा (Diggi Kalyan Ji katha and History In Hindi)
(Diggi Kalyan Ji katha in hindi)-
डिग्गी कल्याण जी (Diggi Kalyan Ji) अथवा डिग्गी पुरी का राजा कहें जाने वाले डिग्गी कल्याण जी की कथा की शुरुआत देवराज इंद्र के दरबार से होती है. देवराज इंद्र देवताओं के राजा थे. देवराज इंद्र के दरबार में कई अप्सराएं थी जो वहां नृत्य करती और देवराज इंद्र का मनोरंजन करती थी.
1 दिन की बात है देवराज इंद्र अपने सिहासन पर बैठे थे, उनके दरबार में उर्वशी नामक एक बहुत ही सुंदर अप्सरा नृत्य कर रही थी. नृत्य के दौरान बेवजह उर्वशी को हंसी आ गई. जब यह दृश्य देवराज इंद्र ने देखा तो उन्हें बहुत बुरा लगा. उन्होंने दरबार के नियमों का हवाला देते हुए क्रोधित होकर उर्वशी को स्वर्ग लोक से धरती पर भेज दिया और 12 वर्षों तक मृत्यु लोक में रहने का कठोर दंड दिया.
देवताओं के राजा होने के कारण अप्सरा उर्वशी ने देवराज इंद्र के आदेश को सहर्ष स्वीकार किया और मृत्यु लोक में 12 वर्षों का दंड भोगने के लिए आ गई. प्रारंभ में उर्वशी सप्त ऋषियों के आश्रम में पहुंची और उनसे शरण मांगी. ऋषियों आज्ञा लेकर वह उनके साथ रहने लगी. कुछ समय बाद उर्वशी ने ऋषियों का आश्रम छोड़कर चंद्रगिरी नामक पर्वत पर शरण ली.
इस दौरान जब उर्वशी को भूख लगती तो वह अपनी भूख शांत करने के लिए घोड़ी का रूप धारण करके चारा ढूंढती रहती. इस समय काल में वहां पर डिगवा नामक राजा राज्य करते थे. डिगवा के महल के समीप एक बहुत ही सुंदर उद्यान था जिसमें अप्सरा उर्वशी घोड़ी का रूप धारण करके भूख शांत करने के लिए आती थी.
धीरे-धीरे जब इस बात का पता राजा को लगा तो उसने रात्रि के समय ध्यान रखा. राजा ने अपने सैनिकों को उस उद्यान की निगरानी के लिए नियुक्त किया और स्वयं भी रात्रि में वहां पर पहुंच गए. जैसे ही स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी उस उद्यान में पहुंची तो राजा और सैनिकों ने उसे पकड़ने के लिए उसका पीछा किया. लेकिन वह बहुत ही तेजी के साथ पर्वतों की और भाग गई. राजा और सैनिक लगातार उसका पीछा करते रहे. जैसे ही वह पर्वत के ऊपर पहुंची उसने एक बहुत ही सुंदर नारी का रूप धारण कर लिया अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप में आ गई.
राजा डिगवा उर्वशी की सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध हो गया. उन्होंने इससे पहले इतनी सुंदर नारी कभी नहीं देखी थी. जब राजा ने उर्वशी से उसके बारे में पूछा तब उर्वशी ने देवराज इंद्र के दरबार में घटित संपूर्ण कहानी उन्हें बताई. यह कहानी जानने के बाद भी राजा डिगवा उर्वशी के मोह जाल में फस गए और उर्वशी से आग्रह किया कि वह उनसे शादी करके राजमहल की शोभा बढ़ाएं.
अप्सरा उर्वशी ने राजा के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया लेकिन बार-बार जिद करने के बाद उर्वशी ने कहा कि वह डिगवा से शादी कर लेगी लेकिन इसके लिए उन्हें एक शर्त माननी पड़ेगी कि जब 12 वर्ष की दंड अवधि समाप्त होने के बाद देवराज इंद्र मुझे लेने आए तब राजा डिगवा मेरी रक्षा करेंगे और अगर रक्षा नहीं कर पाए तो मैं तुम्हें श्राप दे दूंगी.
कहते हैं कि समय किसी का इंतजार नहीं करता. देखते ही देखते 12 वर्ष की अवधि समाप्त हो गई और देवताओं के राजा देवराज इंद्र उर्वशी को लेने के लिए धरतीलोक पहुंचे. तभी राजा डिगवा देवराज इंद्र के सामने आकर खड़े हो गए और उन्होंने बताया कि उर्वशी अब मेरी रानी है आप उसे नहीं ले जा सकते हैं. यदि आप जोर जबरदस्ती करेंगे तो आपको मुझसे ही युद्ध करना पड़ेगा.
फिर क्या था देवताओं के राजा देवराज इंद्र और राजा डिगवा में एक बहुत भयंकर युद्ध हुआ. युद्ध को काफी समय हो चुका था लेकिन ना तो इसमें कोई विजय हुआ ना कोई पराजय हुआ. यह सब देख कर देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से मदद मांगी. भगवान विष्णु की मदद पाकर देवराज इंद्र ने राजा डिगवा को पराजित कर दिया.
राजा डिगवा की पराजय हो जाने के बाद जब देवराज इंद्र उर्वशी को अपने साथ स्वर्ग लोग में ले जाने लगे तभी उर्वशी ने राजा डिगवा को श्राप दिया कि वह आजीवन कुष्ठ रोग से श्रापित रहेंगे. देवराज इंद्र और उर्वशी पुनः चले गए लेकिन कुछ ही समय बाद राजा डिगवा कुष्ठ रोग की चपेट में आ गए.
हर तरह के प्रयास करने के बाद जब राजा डिगवा का रोग ठीक नहीं हुआ तो उन्होंने भगवान विष्णु की तपस्या की. तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने राजा डिगवा को कुष्ठ रोग निवारण का उपाय बताया. भगवान विष्णु ने कहा कि कुछ समय पश्चात उनकी मूर्ति समुद्र में बहकर आएगी जिसके दर्शन मात्र से आपका कुष्ठ रोग सदा के लिए समाप्त हो जाएगा.
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