Перейти к содержимому

रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड(दोहा:३९-४९)

RamcharitManas-Kashi

0:00 / 0:00

रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड(दोहा:३९-४९)

18 438 просмотров · 1 год назад
RamcharitManas-Kashi
117 тыс. подписчиков
18 438 просмотров · 1 год назад
रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड प्लेलिस्ट    • रामचरितमानस मूलपाठ:उत्तरकाण्ड   दो. पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥ ३९ ॥ लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥ काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥ जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥ स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥ मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥ करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा ॥ अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥ बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥ दो. ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं। द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥ ४० ॥ पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥ निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥ नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥ करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना ॥ कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥ अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥ त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥ संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥ दो. सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥ ४१ ॥ श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥ करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा ॥ पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए ॥ बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं ॥ नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥ सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥ सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं ॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी ॥ सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥ दो. जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥ ४२ ॥ एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए ॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन ॥ सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी ॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई ॥ सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई ॥ जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई ॥ बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा ॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥ दो. सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥ ४३ ॥ एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥ ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥ आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥ फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥ नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥ दो. जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ ४४ ॥ जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू ॥ सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥ ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥ करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥ भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ॥ पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ॥ दो. औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि ॥ ४५ ॥ कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा ॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई ॥ मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥ बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥ बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥ अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥ प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥ दो. मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह। ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥ ४६ ॥ सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥ जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥ तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥ असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥ हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥ स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥ सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥ निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥ दो. -उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप। ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप ॥ ४७ ॥ एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥ अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥ राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥ देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥ महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥ जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही ॥ परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा ॥ https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherl...