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निर्विचार विलम्ब में किस तरह स्थापित हो

Absolute Truth sahaja yoga

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निर्विचार विलम्ब में किस तरह स्थापित हो

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अब इस लफ्ट हैंड की ओर हमारा अतीत है। हमारा अतीत हमारा पास्ट लेफ्ट हैंड की तरफ हैं। जो आज कुछ हमने आज तक किया है वो सब हमारे लेफ्ट में है। हमारी इड़ा नाड़ी में पूरा के पूरा है। इसी से वो संस्था बनती है जिसे की हम मन कहते हैं या तो सुपर इगो कहते हैं। आपने बह़त बार सुना होगा मेरा मन नहीं चाहता। मन है क्या ये मन आप नहीं है. ये मन है। लोग कहते हैं कि मेरा मन नहीं चाहता करने को। बचपन से बैठी हुए संस्कार, बचपन से बैठे हुए दिमागी जमाखर्च और पुर्वजन्म के बैठे हुये जितने भी आपके अनुभव हैं सारे ही आपके लेफ्ट साइड में बैठे हये हैं। अच्छे, बुरे सब तरह के आपके लेफ्ट साइड़ में बैठे हुये हैं। और आपके राइट हैंड साइड में आपक भविष्य है। राइट हैंड साइड में आप जो सोचते हैं आगे का. ये करने का है: वो करने का है. प्लॅनिंग करने का है ऐसा करने का है, वहाँ जाने का है, इसे मिलने का है, ये सारा कृछ आपके राइट हैंड साइड में होता है। उसी प्रकार 'हमारे शरीर की चिंता करना। हमारा शरीर ठीक कैसे रहेगा ? शरीर में ये ये तकलीफ है, और किसी आने वाले मुत्य से डरना ये सब राइट हैंड साइड में हो जाते हैं पर सुषुम्ना, जो बीच का स्थान है, वो है आपका प्रेझेंट माने वर्तमान। मैं आपसे कहु कि आप इस वक्त रुक जाईये,इसी वक्त आप यहाँ पर रुक जाये। तो हो नहीं सकता। रियलाइज्ड सोल का होगा, बाकि नहीं रुक सकते। क्योंकि एक विचार उठता है कि वो खत्म हो जाता है। आप उसका उठना देख सकते हैं. गिरना नहीं देख सकते। दु सरा विचार उठता है कि वो भी गिर जाता है। इन दोनों के बीच में जो जगह है, वो विलंब हैं. वही प्रेजेंट है। वो उठा विचार और गिर गया, वो अतीत में चला गया, वो तो पास्ट में चला गया और जो विचार आने वाला है, वो सामने के लिये बना हआ है। वो आपके भविष्य में, फ्यूचर में चला गया। लेकिन इसके बीच में जो थोड़ी सी जगह होती है, जिसे विलंब कहते हैं. वो जगह,वही प्रेझेंट है और वो हर इन्सान में इतनी छोटी सी होती है. कि इन्सान एक विचार खोपड़ी में आये नहीं कि दुसरे पे कुदा, तीसरे पे कुद रहा है, चौथे पे कूद रहा है। हर समय कुदते ही रहता है। इसलिये वो अन्दर उतर नहीं पाता है *और यहीं चीज़ जब कुण्डलिनी ऊपर चढ़ती है, तो ये दोनों ही मन और अहंकार को ऐसे निचोड़ लेती है, ये दोनों ही चीज़े एकदम से, जैसे कि कोई गुब्बारे में से हवा निकल जाये, ऐसे हो जाती है और डसके कारण हमारा विलंब स्थापित होता है। इसलिये हम निर्विचार हो सकते