HIMALAYAN HIGHWAYS| Nanda's doli in Vedni| UTTARAKHAND| CHAMOLI| VEDNI|
Himalayan Highways
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हिमालयन हाइवेज आज आपके लिए लेकर आया है सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में हर साल आयोजित होने वाली जात YATRAA| आज हम आपको चमोली जनपद के वेदनी बुग्याल लेकर चलेंगे जहां से कुलदेवी नंदा अपने ससुराल के लिए रवाना होती है।
कोहरे से लिपटी हिमालय की वादियां, आंसमा से बरसती बारिस की बूंदे, घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्ता और हिमालय के बुग्यालों में भक्तों के कंधों पर दौड़ती मां नन्दा की डोली। जी हां यही है माँ नन्दा का ससुराल। हर साल दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों से होकर अपने मायके से ससुराल तक के सफर मां नन्दा ऐसे ही तय करती है। कुरुड़ से कैलाश की यह यात्रा जब अपने आखिरी पड़ाव वेदनी पहुंचती है तो भावुक दृश्यों ओर नम आंखें सब कुछ बयां कर जाती है। आज के इस एपिसोड में हम आपके लिए लेकर आये है वेदनी बुग्याल में मां नन्दा की ससुराल विदाई के वो दर्शय जो उत्तराखण्ड की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हिमालयन हाइवेज उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति ओर लोकपरंपरा ओ का पूरा सम्मान करता है लिहाजा स्थानीय लोगों की भावनाओ के मुताबिक हम वेदनी में लाटू देवता के अवतरित होने के दर्शय सार्वजनिक नहीं करेंगे।
मां नन्दा के मायके से ससुराल जाने के सफर में आखिरी आबादी वाला पड़ाव वाण गांव है। वाण गांव में नन्दा के धर्मभाई लाटू देवता का मंदिर है और यहां से आगे का सफर मां नन्दा अपने धर्मभाई लाटू देवता के साथ ही तय करती है। माँ नन्दा को विदा करने के लिए पहुंचा जनसमुदाय घने जंगलो के बीच से गैरोली पहुंचता है जहां रात्रि विश्राम के बाद मां की डोली वेदनी बुग्याल के लिए रवाना होती है। स्थनीय बुजुर्ग महिलाएं युवा हर साल इस यात्रा में वेदनी कुंड तक पहुंचते है जहां नन्दा को जनसमुदाय मायके के लिए विदा करता है। नन्दा को विदा करते समय आगे के सफर की व्यथा सुनाते लोक जागर वेदनी के शांत पानी तक मे हलचल पैदा कर जाते है।
बुग्यालों में हर पल बदलते मौसम के बीच जब मां नन्दा की डोली वेदनी पहुंचती है तो यहाँ मौजूद लोगों के साथ प्रकृति भी मानो भावुक हो जाती है। वेदनी कुंड के चारों तरफ घने कोहरे की चादर एकाएक सब ढक देती है शायद यही प्रकृति का तरीका हो स्वागत करने का। मौसम खुलने के साथ ही वेदनी पहुंचे भक्त नन्दा का दर्शन करते है। वेदनी कुंड का स्थानीय क्षेत्र में बड़ा धार्मिक महत्त्व है और हर साल यहां लोग अपने पितरों को याद करने भी पहुंचते है।
स्थनीय लोग हर साल मां नन्दा को ससुराल विदा करने के लिए वेदनी आते है। वेदनी कुंड के ठंडे पानी मे स्नान करने के बाद यहां मां नन्दा की डोली का स्वागत किया जाता है। धार्मिक रीति-रिवाजों को निभाने के बाद उपस्थित लोगों का समूह वापस अपने घर लौट जाता है और नन्दा यहां से आगे कैलाश पर्वत के दुर्गम सफर पर निकल पड़ती है। हिमालयिनक्षेत्रो में मां नन्दा की कैलाश यात्रा लोगों के जीवन का हिस्सा है जिसे हर साल यहां का जनसमुदाय शिद्दत से निभाते जा रहा है। ।
हिमालयी क्षेत्रों में नन्दा कुलदेवी मानी जाती है और यही इंसान ओर भगवान के रिश्ते को दर्शाता है। अपने भक्तों की हर परेशानी हरने वाली कुलदेवी को जब भक्त ससुराल विदा करते हैतो यह रिश्ता खास हो जाता है। कुलदेवी नन्दा हिमालयी क्षेत्रों में एक बेटी भी है और एक बहु भी। कैलाश पर्वत तक का यह सफर आगे और भी दुर्गम ओर खतरनाक है लिहाजा कुलदेवी के सफर की मुश्किलें यहां लोग महसूस करते है।। ससुराल का यह सफर जरूरी भी है क्योंकि नन्दा को अगले बरस फिर मायके भी तो आना है। सदियो से चली आ रही यह परम्परा हर साल निभाई जाती है और निभाई जाती रहेगी।
बुग्यालों की मखमली घास में बारिस की बूंदों ओर कोहरे की चादर से निकलकर नन्दा अपने आगे के सफर पर रवाना हो जाती है। वेदनी में जनसमुदाय हाथ जोड़कर मां नन्दा के सुखद सफर की कामना करता नजर आता है। इष्टदेवी नन्दा को विदा कर लोग वापस घर लौट आते है। हिमालयी क्षेत्र में इष्टदेवी के साथ लोगों का यह सम्बन्ध भक्त और भगवान के बीच के रिश्ते को नई परिभाषा दे जाता है। विकट परिस्थिति वाले हिमालयी जीवन में नन्दा जहां एक हौसला है जीवन जीने का वहीं सबक है पृष्टितियो से कभी हार न मानने का। हिमालयन हाइवेज का आज का सफर बस इतना ही आपको हमारा यह एपिसोड कैसा लगा कमेंट कर जरूर बताएं।
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