सोहर : बितले महीनवाँ जे सावन | डॉ. राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | डॉ. दुर्गेश उपाध्याय | गुरु दयाल
भोजपुरी के साधक - Durgesh Upadhyay
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सोहर : बितले महीनवाँ जे सावन | डॉ. राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | डॉ. दुर्गेश उपाध्याय | गुरु दयाल
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भोजपुरी के साधक - Durgesh Upadhyay
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यह रचना मूलतः सोहर की लोक-परंपरा में रची गई है, लेकिन इसकी कथा-भूमि साधारण प्रसव-उत्सव से आगे बढ़कर देवकी–कृष्ण जन्म प्रसंग से जुड़ती है। इसमें लोकभाषा, स्त्री-मन, मातृत्व की पीड़ा, राजकीय विवशता और दैवी आशा—सभी एक साथ दिखाई देते हैं।
“बीतले महीनवा जे सावन अति मनभावन हो,
ए ललना आई गइली भादो के अन्हरिया, तऽ देखत भेयावन हो।”
यहाँ सावन के बीत जाने और भादो की अँधेरी रात के आगमन के माध्यम से कृष्ण-जन्म की पृष्ठभूमि निर्मित होती है। भारतीय लोकजीवन में सावन और भादो केवल ऋतु-सूचक महीने नहीं हैं, बल्कि भावनाओं, हरियाली, वर्षा, विरह और नवजीवन के प्रतीक हैं। भाद्रपद की कृष्णपक्षीय अँधेरी रात में मथुरा के कारागार में देवकी के गर्भ से कृष्ण का जन्म होता है। लोकगीतकार ने इस ऐतिहासिक-पौराणिक प्रसंग को लोक-स्मृति के अत्यंत निकट ला दिया है। “अन्हरिया” केवल बाहर के अँधेरे का संकेत नहीं, बल्कि देवकी के जीवन पर छाए संकट और कंस के अत्याचार का भी प्रतीक है।
“जेलवा में बीतली जवनिया त बंस के निसानी बीते हो,
ए ललना पाकल कनपटिया के बार निरखी राजा झखेले हो।”
देवकी का यौवन कारागार में बीत रहा है। उसके गर्भ से उत्पन्न संतान उसके वंश की निशानी है, लेकिन वही संतान कंस के लिए भय का कारण है। यहाँ लोकगीतकार ने “जेलवा” और “जवनिया” जैसे अत्यंत सहज भोजपुरी शब्दों के माध्यम से देवकी की पीड़ा को राजमहल की कथा न रहने देकर सामान्य स्त्री के अनुभव में बदल दिया है। “पाकल कनपटिया के बार निरखी” में प्रतीक्षा, भय और समय के बीतने की अनुभूति है। राजा की व्याकुलता और बेचैनी इस बात का संकेत देती है कि आने वाली संतान केवल एक बालक नहीं, बल्कि अत्याचार के अंत की संभावित घोषणा है।
“सुतल रानी के जगावे जगाई के सुनावे नु हो,
ए रानी बीतल समइया हमार जुकिती एको ना सूझे हो।”
यहाँ दृश्य अत्यंत मानवीय हो जाता है। राजा देवकी को जगाता है और अपनी विवशता व्यक्त करता है। “जुकिती” अर्थात उपाय या युक्ति—“एकौ ना सूझे” में उस असहाय स्थिति की चरम अभिव्यक्ति है। कंस के भय से कृष्ण को बचाने की चिंता, भविष्यवाणी का आतंक और राजसत्ता की विवशता—इन सबका लोकभाषिक रूप इस पंक्ति में मिलता है।
“सुसुकत उठे रानी देवकी रोवत नकिया गारत हो,
ए राजा! बीती राति अब होई भोर तू आदित मनावहु हो।”
देवकी का “सुसुकत उठना” स्त्री की दबाई हुई पीड़ा का अत्यंत मार्मिक चित्र है। वह विलाप करती है, किंतु उसके भीतर आशा की एक किरण भी है—“बीती राति अब होई भोर।” यहाँ रात और भोर का प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण है। रात कंस के अत्याचार, कारागार और भय का प्रतीक है, जबकि भोर मुक्ति, आशा और कृष्ण के आगमन का संकेत है। “आदित मनावहु” में लोकविश्वास और धार्मिक आस्था का सुंदर समावेश है—सूर्य से प्रार्थना करना अर्थात अंधकार के अंत और प्रकाश के आगमन की कामना करना।
“हथवा पसारी भीखी मंगले आँचर रोकि देवकी न हो,
ए ललना! कर जोरि मनावेले भवानी, सुनेलें सिव दानी न हो।”
अंतिम अंश में देवकी की व्यथा व्यक्तिगत सीमा से निकलकर लोक-आस्था का रूप ले लेती है। वह अपने आँचल को फैलाकर भीख माँगने को तैयार है, लेकिन उसकी याचना धन या सुख के लिए नहीं, बल्कि अपने ललना के जीवन और रक्षा के लिए है। “कर जोरी” अर्थात हाथ जोड़कर भवानी की प्रार्थना करना भोजपुरी लोक-संस्कृति में स्त्री की सहज धार्मिक चेतना का परिचायक है। भवानी और शिव का स्मरण इस प्रसंग को व्यापक लोक-धार्मिक विश्वास से जोड़ देता है। लोक में देवी माँ से संतान, उसकी रक्षा और मंगल की कामना करने की परंपरा रही है।
इस सोहर की विशेषता यह है कि पुराण और लोक एक-दूसरे में घुल जाते हैं। कृष्ण का जन्म मूलतः महाभारत की कृष्ण-कथा तथा हरिवंश और भागवत परंपरा से संबंधित है। देवकी और वसुदेव, कंस का अत्याचार, कारागार, कृष्ण का जन्म और जन्म के बाद उनका गोकुल पहुँचना—ये घटनाएँ भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में अत्यंत गहरे पैठी हुई हैं।
लेकिन डॉ. रामनारायण तिवारी ‘भदवरिया’ ©® की रचना में यह कथा किसी संस्कृत महाकाव्य की औपचारिक भाषा में नहीं आती। वह भोजपुरी लोकजीवन की स्त्री के कंठ से निकलती हुई प्रतीत होती है। “महीनवा”, “जेलवा”, “ललना”, “रानी”, “अँचर”, “कर जोरी”, “सुसुकत”—ये शब्द कथा को लोक के घर-आँगन में उतार देते हैं। इसीलिए देवकी यहाँ केवल द्वापरयुग की महारानी नहीं रह जातीं; वह हर उस माँ का रूप बन जाती हैं जो प्रसव, संतान और उसके भविष्य को लेकर आशंकित और भावुक रहती है।
सोहर की लोकपरंपरा में सामान्यतः बालक के जन्म पर मंगलगान, बधाई, स्त्री-समुदाय की सामूहिक भागीदारी और मातृत्व के उल्लास का चित्रण होता है। इस रचना में उसी परंपरा का एक विलक्षण रूप दिखाई देता है—यहाँ जन्म के उल्लास से पहले जन्म की पीड़ा और भय है। अर्थात कृष्ण-जन्म का मंगल अंततः अंधकार को चीरने वाले प्रकाश के रूप में सामने आता है।
इस दृष्टि से यह सोहर केवल कृष्ण-जन्म का गीत नहीं, बल्कि लोक-स्मृति में सुरक्षित मातृत्व, संघर्ष, आस्था और मुक्ति का गीत है। सावन से भादो, अँधेरी रात से भोर, कारागार से मुक्ति और देवकी की करुण पुकार से कृष्ण के अवतरण तक—पूरी रचना अंधकार से प्रकाश की सांस्कृतिक यात्रा बन जाती है। यही इसकी सबसे बड़ी लोक-साहित्यिक और सांस्कृतिक शक्ति है।
@topfans Ram Narayan Tiwari Durgesh K. Upadhyay Guru Dayal Music of Durgesh