📖 श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 2, श्लोक 4 और 5 | अर्थ सहित
Adhyatmik Shubham
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📖 श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 2, श्लोक 4 और 5 | अर्थ सहित
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📖 श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 2, श्लोक 4 और 5 | अर्थ सहित
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन के सामने केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि एक गहरा धर्म-संकट खड़ा था।
एक ओर उनका कर्तव्य था और दूसरी ओर सामने खड़े थे उनके पूजनीय भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य। जिनसे अर्जुन ने प्रेम, सम्मान और शिक्षा प्राप्त की, उन्हीं के विरुद्ध आज उन्हें हथियार उठाना था।
इसी दुविधा में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से अपने मन की बात कहते हैं।
🕉️ श्लोक 4
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे मधुसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य जैसे पूजनीय व्यक्तियों के साथ बाणों से युद्ध कैसे करूँ?
अर्जुन के लिए यह प्रश्न बहुत गहरा था। वे जानते थे कि युद्ध उनका कर्तव्य है, लेकिन अपने ही पूजनीय गुरु और पितामह के विरुद्ध बाण चलाने का विचार उनके हृदय को विचलित कर रहा था।
इसी कारण अर्जुन आगे कहते हैं—
🕉️ श्लोक 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावाञ्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थ:
ऐसे महान और पूजनीय गुरुओं को मारने की अपेक्षा इस संसार में भिक्षा मांगकर जीवन बिताना भी मेरे लिए अधिक श्रेयस्कर है। क्योंकि यदि मैं इन्हें मारकर प्राप्त होने वाले भोगों को भोगूँगा, तो वे मानो रक्त से सने हुए होंगे।
🌿 अर्जुन की दुविधा
अर्जुन सोच रहे थे कि यदि अपने ही गुरु और पितामह को मारकर उन्हें राज्य और सुख प्राप्त भी हो जाए, तो ऐसी विजय का क्या अर्थ होगा?
उनके सामने प्रश्न केवल जीत या हार का नहीं था।
प्रश्न था—
क्या अपने प्रिय और पूजनीय लोगों को खोकर प्राप्त किया गया राज्य वास्तव में सुख दे सकता है?
अर्जुन को लग रहा था कि ऐसी विजय के बाद मिलने वाले सुख भी उनके लिए पीड़ा से भरे होंगे। इसलिए वे कहते हैं कि ऐसे राज्य और भोगों से तो भिक्षा मांगकर जीवन बिताना भी बेहतर है।
यही अर्जुन का धर्म-संकट और कर्तव्य के प्रति उनका आंतरिक संघर्ष था।
लेकिन अर्जुन की यह दुविधा अभी समाप्त नहीं हुई थी। आगे वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा कि उनके लिए वास्तव में क्या श्रेष्ठ है।
और यहीं से अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के सामने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न रखने की ओर बढ़ते हैं।
🔔 अगले श्लोक में
अर्जुन कहेंगे—
“हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है—हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें…”
और इसके बाद अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन की याचना करते हुए स्वयं को उनका शिष्य स्वीकार करते हैं।
आखिर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से क्या कहा?
और क्यों उन्होंने अपना निर्णय भगवान श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया?
जानेंगे अगले श्लोक में।
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