देव, भीषणाकार भैरव (भैरव स्तुति) #shiv #bhajan #stuti #bhakti #tulsidas #vinaypatrika #youtubevideo
DR. SATYENDU SHARMA
0:00 / 0:00
देव, भीषणाकार भैरव (भैरव स्तुति) #shiv #bhajan #stuti #bhakti #tulsidas #vinaypatrika #youtubevideo
35 просмотров · 3 дн. назад
DR. SATYENDU SHARMA
570 подписчиков
35 просмотров · 3 дн. назад
इस वीडियो में सन्त तुलसीदास कृत विनय पत्रिका से गृहीत पद का गान प्रस्तुत किया गया है । यहाँ तुलसीदास भगवान् भैरव रूपी शिव को सम्बोधित करते हुए कह रहे हैं -
हे भीषणमूर्ति भैरव ! आप भयंकर हैं। भूत, प्रेत और गणोंके स्वामी हैं। विपत्तियों के हरण करनेवाले हैं। मोहरूपी चूहे के लिये आप बिलाव हैं; जन्म-मरणरूप संसार के भय को दूर करनेवाले हैं; सबको तारनेवाले, स्वयं मुक्तरूप और सबको अभय करनेवाले हैं ।
(फिर भगवान् के गुणों का विस्तृ वर्णन करने के पश्चात् तुलसीदास कहते हैं)
इस पाप-सन्ताप से पूर्ण भयानक संसार में मैं दीन होकर चौरासी लाख योनियों में भटक रहा हूँ, मुझे कोई भी बचानेवाला नहीं है। हे भैरवरूप ! हे रामरूपी रुद्र ! आप ही मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता हैं। मेरी रक्षा कीजिये । जिनके गुणों का निर्मल बुद्धिमती सरस्वती, वेद और नारद आदि ब्रह्मज्ञानी तथा शेषजी सदा गान करते हैं, तुलसीदास कहते हैं, वे भक्तों को अभय प्रदान करनेवाले सर्वेश्वर शिवजी आनन्दवन काशीमें विराजमान हैं ।
संपूर्ण पद -
देव, भीषणाकार, भैरव, भयंकर, भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति, विपति-हर्ता।
मोह-मूषक-मार्जार, संसार-भय-हरण, तारण-तरण, अभय कर्ता॥१॥
अतुल बल, विपुलविस्तार, विग्रहगौर, अमल अति धवल धरणीधराभं।
शिरसि संकुलित-कल-जूट पिंगलजटा, पटल शत-कोटि-विद्युच्छटाभं॥२॥
भ्राज विबुधापगा आपपावन परम, मौलि मालेव शोभा विचित्रं ।
ललित लल्लाट पर राज रजनीशकल, कलाधर, नौमि हर धनद मित्रं ॥ ३ ॥
इंदु पावक-भानु-नयन, मर्दन-मयन, गुण-अयन,ज्ञान-विज्ञान रूपं ।
रमण गिरिजा, भवन भूधराधिप सदा, श्रवण कुंडल, वदनछवि अनूपं ॥ ४ ॥
चर्म असि-शूल-धर, डमरु-शर-चाप-कर, यान वृषभेश, करुणा निधानं ।
जरत सुर-असुर, नरलोक शोकाकुलं,मृदुल चित, अजित, कृत गरलपानं ।। ५ ॥
भस्म तनु-भूषणं, व्याघ्र चर्माम्बरं, उरग नर मौलि उर मालधारी ।
डाकिनी, शाकिनी, खेचरं, भूचरं,यंत्र-मंत्र भंजन, प्रबल कल्मषारी ॥ ६ ॥
काल अतिकाल, कलिकाल, व्यालादि खग,त्रिपुर-मर्दन, भीम कर्म भारी ।
सकल लोकान्त-कल्पान्त शूलाग्र कृत दिग्गजाव्यक्त गुण नृत्यकारी ॥ ७ ॥
पाप-संताप घनघोर संसृति दीन, भ्रमत जग योनि नहिं कोपि त्राता।
पाहि भैरव रूप राम रूपी रुद्र, बंधु, गुरु, जनक, जननी, विधाता ॥ ८ ॥
यस्य गुण-गण गणति विमल मति शारदा, निगम नारद प्रमुख ब्रह्मचारी ।
शेष, सर्वेश, आसीन आनंदवन, दास तुलसी प्रणत त्रासहारी ॥ ९ ॥