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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 19**(सिमरन एवं सेवा) भाग २**योग क्षेम भाग-२* ‪@bhaktimeshakti2281‬

Bhakti me Shakti

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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 19**(सिमरन एवं सेवा) भाग २**योग क्षेम भाग-२* ‪@bhaktimeshakti2281‬

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Ram bhakti ‪@bhaktimeshakti2281‬ परम पूज्य डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से ((2059)) श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 19 (सिमरन एवं सेवा) भाग २ योग क्षेम भाग-२ आज देवियो सज्जनो सिमरन एवं सेवा की चर्चा करते हैं । क्या करते हैं यह सिमरन एवं सेवा हमारे जीवन में । सर्वप्रथम मन के शुद्धीकरण का सर्वोच्च एवं सुगमतम साधन, अमोघ साधन, सिमरन एवं सेवा । हम सब भी सिमरन एवं सेवा के उपासक हैं । हमारी साधना सिमरन एवं सेवा की । *हां, इसके साथ ही जो सेवा के क्षेत्र में उतरेगा, यदि वह संयमी नहीं है, तो मार खाएगा । गिर जाएगा । पतन को प्राप्त होगा। इसके साथ दो शब्द और लगा लो तो साधना पूरी हो जाती है - *सिमरन, सेवा, संयम । यह कहां से प्रेरणा मिलेगी । फिर चौथा शब्द भी “स” अक्षर से शुरू होता है, जिसे सत्संग कहा जाता है। यही चार शब्द याद रखो देवियो सज्जनो । हमारे जीवन में पूर्णत्व की प्राप्ति इन्हीं से होती है सिमरन, सेवा, संयम एवं सत्संग । यह चार शब्द जीवन की पूर्णता देने के लिए बिल्कुल सक्षम है, पर्याप्त हैं । *मन का शुद्धिकरण सिमरन एवं सेवा से । आज साधक जनो एक युवक बाबा नानक के पास आए है । बाबा नानक उससे प्रश्न करते हैं, एक बात बताओ - *मुझे बहुत बड़ा संशय है । यह संतों महात्माओं के विषय में इतना कुछ शास्त्रों ने लिखा है, ना कोई संसार उनमें लगता है, क्या यह सत्य है ? बाबा नानक से प्रश्न । बाबा नानक कहते हैं, युवक तू क्या सोचता है । तू अपनी बात पहले बता । तू इन संतो के बारे में क्या सोचता है । युवक कहता है मैं सोचता हूं यह धरती पर बोझ है ‌। पशुवत जीवन व्यतीत करते हैं, दूसरों का खाना खाते हैं, दूसरों पर निर्भर रहते हैं, इनका अपना जीवन कुछ नहीं, धरती पर बोझ हैं। *बाबा नानक यह बात सुनकर तो समझ गए, बहुत ही मलिन मन का व्यक्ति है । इसका मन ठीक नहीं, विचारधारा ठीक नहीं । तो मन पर निर्भर करती है । मन कैसा है, उसी के अनुसार आप की विचारधारा ।यदि विचार इसके अच्छे नहीं हैं, सही नहीं है, तो मानो इसका मन ठीक नहीं है ।* कहा वत्स थोड़े दिन यहां रहो । जूतियां साफ करो, झूठे बर्तन साफ करो। लंगर की सेवा दे दी । साथ ही साथ राम राम जपते रहना । कहा मैं भी राम-राम जपता हूं, सिमरन करता हूं परमात्मा का । तू भी साथ साथ सिमरन करना । पशुओं का काम करना, गोबर इत्यादि उठाना, जो भी तीन-चार काम उसे दे दिए । मानो सिमरन एवं सेवा दोनों का संगम कर दिया यह कर । तीन एक साल व्यतीत हुए होंगे । यह काम दिनों में नहीं होता । तीन एक साल व्यतीत हुए होंगे । आज उसे बुलाया । कहा भाई उस दिन आपने संतो के बारे में कुछ कहा था, आज तू क्या कहता है ? कहा बाबा ऐसा लगता है जैसे बहुत अमीर व्यक्ति इस वक्त यहां आए हुए हैं । पुराने पुण्यकर्मी है, और पुराना पुण्य खा रहे हैं । यह अमीरी इस वक्त की, यह अफसरी इस वक्त की क्या है । पुराने पुण्य किए हुए । अभी इसमें तो कुछ ऐसा नहीं । प्रारब्ध इकट्ठी करी हुई । पुराने पुण्य इकट्ठे किए हुए, उनके कारण व्यक्ति अमीर है । उनके कारण सब खुशहाली है । prosperity है । किस कारण ? पुराने पुण्यों के कारण । जिस प्रकार अमीर पुराने पुण्यों पर जी रहे हैं, आनंद लूट रहे हैं, इसी प्रकार से संत महात्मा भी कोई पुराने पुण्यकर्मी होंगे, वह मौज कर रहे हैं ।कुछ करना नहीं पड़ता । बनी बनाई मिलती है । कोई कपड़े दे देता है, कोई रोटी दे देता है, कोई रहने को जगह दे देता है, इत्यादि इत्यादि । कहा - वत्स थोड़ी देर और रहो यहां । तीन साल और बीते । आज फिर पूछा अब युवक तू संतो के बारे में क्या कहता है ? देव तुल्य हैं संत, देवतुल्य । देवताओं के समान हैं । तीन साल सेवा और करवाई । बारह साल के बाद आज बाबा नानक ने फिर बुलाकर पूछा युवक अब तेरी संतो के बारे में क्या राय है ? कहा - बाबा ऐसा लगता है वह अकाल पुरख, संतों का रूप धारण करके तो, हमारे कल्याण के लिए यहां आता रहता है । बाबा ने कहा वत्स संत तो वही है । कोई अंतर नहीं । सिर्फ बदला है तो साधना से, सिमरन एवं सेवा से, तेरी विचारधारा बदली है । वह गंदा मन साफ हुआ है । सिमरन एवं सेवा अमोघ साधन है, मन के शुद्धिकरण के लिए। मन पवित्र होता है । देवियो सज्जनो जब तक मन पवित्र नहीं होगा तो यह मन शंकाशील रहेगा‌ । संशय उठते रहेंगे, शंकाएं उठती रहेंगी । Arrogant रहोगे, अभिमानी रहोगे, यह झुकने नहीं देगा मन आपको । नम्रता नहीं आएगी, विनम्रता नहीं आएगी। झुकना नहीं सीखोगे, तो जो सुना हुआ है उसे ग्रहण भी नहीं कर सकोगे । बिना झुके आज तक कोई कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाया । बेशक लाखों वर्ष बीत जाए, कथा सुनने में, शास्त्र पढ़ने में । बिना झुके हुए आदमी कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता । यह शास्त्रों का पक्का नियम है । बहुत बल है देवियो सज्जनो इस सिमरन एवं सेवा में । एक छोटे से दृष्टांत के माध्यम से देखिएगा । आज एक महिला दादू के पास गई है । संत, बहुत बड़े संत हुए हैं‌ । संत दादू के पास गई है । जाकर कहती है- प्रभु कुछ मेरे ऊपर ऐसी कृपा करो, कुछ मुझे ऐसा यंत्र मंत्र दो, कि मेरा पति मेरे वश में हो जाए । मैंने सुना है बहुत सारी महिलाएं ऐसा करती हैं आजकल । अपने पति को अपने इशारों पर चलाना चाहती हैं । ऐसे में वह बुद्धिमता मानती हैं, बड़प्पन मानती हैं । यह महिला भी गई है । संत ने कहा देवी मैं किसी मंत्र यंत्र को नहीं जानता । मैं राम-राम जपता हूं, औरों को राम-राम जपने के लिए कहता हूं । बस इससे अधिक मुझे कुछ नहीं आता । पर तुम्हें यकीन दिलाता हूं, यह राम राम जपना, सिमरन करना, प्रेम पूर्वक करना, इतना बलशाली है, कि इससे परमात्मा वश में हो जाते हैं, तो इंसान की क्या औकात कि वह वश में ना हो । तू राम राम जप । प्रेम पूर्वक अपने पति की सेवा कर । सब कुछ ठीक हो जाएगा ।