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ब्राह्मण के मृत बालक के लिए अर्जुन ने यमलोक पर किया आक्रमण | Shri Krishna Jeevani

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ब्राह्मण के मृत बालक के लिए अर्जुन ने यमलोक पर किया आक्रमण | Shri Krishna Jeevani

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एक दिन श्रीकृष्ण यादवों के लिए कल्याण यज्ञ कर रहे थे। तभी अपने पुत्रों की अकाल मृत्यु की पीड़ा से दुखी ब्राह्मण रक्षा की गुहार लगाता हुआ आता यज्ञशाला में आता है, उन्हें धिक्कारते हुए कहता है आपकी द्वारिका पुरी में जहाँ नवजात पुत्रों के प्राण हरण का पाप किया जा रहा है और आप इस यज्ञ में आहुति देकर धर्म पालन का नाटक कर रहे हैं। श्रीकृष्ण उसके आरोपों को मिथ्या बताते है, परंतु वह ब्राह्मण कहता है कि मैं अपने तीन पुत्रों की लाश आपके द्वार पर ला चुका हूँ, लेकिन आपके चाटुकार सत्य को आप तक नहीं पहुँचाते है। अब आप मेरे साथ अभी चलिए, क्योंकि मेरी पत्नी चौथे पुत्र को जन्म देने जा रही है। श्रीकृष्ण अपनी विवशता बताते हुए कहते है कि मैं इस यज्ञ अग्नि में आहुतियाँ अर्पित कर रहा हूँ। यह सुन ब्राह्मण श्रीकृष्ण के कटु वचनों का प्रयोग करने लगता है। अपने मित्र की निंदा अर्जुन से बर्दाश्त नहीं होती है और वह स्वयं ब्राह्मण के पुत्रों की रक्षा करने वचन देता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि काल को अपनी गति से चलने दो, किन्तु अर्जुन कहते हैं कि मैं अपने सामने आपकी निंदा नहीं सुन सकता। यह कह अर्जुन ब्राह्मण के साथ उसके गाँव जाते है और उसकी कुटिया के चारों ओर अपने बाणों से सुरक्षा कवच बना देते है। तभी कुटिया के अंदर एक नवजात शिशु के रोने की आवाज आती है। उसकी आवाज को सुनकर प्रसन्न ब्राह्मण जैसे ही कुटिया में अंदर जाने के लिए आगे बढ़ता है, एक भयानक आवाज के साथ सुरक्षा कवच टूट जाता है और उस नवजात की आत्मा आकाश की ओर चली जाती है। यह देख ब्राह्मण अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण को पुनः कोसने लगता है। इस घटना से अवाक अर्जुन ब्राह्मण को वचन देता है कि वह उसके बालक को यमलोक से वापस लाएगा। अर्जुन अपनी वैष्णवी शक्ति का प्रयोग करके यमलोक पहुँच जाते है। यमलोक का द्वार बंद देख अपने दिव्य बाणों से द्वार तोड़ने का प्रयास करते हैं किन्तु असफल रहने पर विवश होकर ब्रह्मास्त्र चलाने की घोषणा कर देते हैं और इस कार्य के लिए ब्रह्मा जी से भी आज्ञा भी माँगते है। ब्रह्मास्त्र का संधान होते हुए संपूर्ण ब्रह्माण्ड में हलचल मच जाती है। अर्जुन को रोकने के लिए स्वयं देवराज इंद्र प्रकट होते है और उसे समझाते है कि एक धर्म का पालन करने के लिए बड़े धर्म बलिदान नहीं किया जा सकता है, सृष्टि का विनाश नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जीवन और मृत्यु का अधिकार किसी के पास नहीं है, इसलिए हठ छोड़ ब्रह्मास्त्र को वापस तूणीर में रख दो। वही दूसरी ओर जब सुभद्रा को पता चलता है कि अर्जुन एक ब्राह्मण बालक के लिए यमलोक चले गए है, वह विचलित हो उठती है। यमलोक से हताश लौटे अर्जुन अपना वचन निभाने के लिए अग्नि में जलकर प्राण त्यागने का निर्णय करता है और इसलिए वह अपने बाण से अग्नि प्रकट करता है। तभी श्रीकृष्ण वहाँ पहुँच जाते है और अर्जुन से कहते है कि इसके लिए उसका मय जिम्मेदार है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य तर्क-वितर्क होता है और अंत श्रीकृष्ण अर्जुन को यमलोक के आगे के लोक दिखाने के लिए अपने साथ ले चलते है। श्रीकृष्ण का रथ अनेक लोकों को पार करता हुए एक ऐसे स्थान पर पहुँचता है, जहाँ अंधेरा ही अंधेरा था। आगे का मार्ग सुदर्शन चक्र का प्रकाश दिखाता है। उस प्रकाश में अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप दिखाई देता है, जो श्रीकृष्ण और अर्जुन को जीवन काल से जुड़े रहस्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के बाद कहते है कि तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो, जो पृथ्वी लोक से अधर्मियों का संहार करके मेरे पास वापस लौट आओगे। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण के सारे पुत्र लौटा देते है। जिन्हें अपने साथ लेकर अर्जुन और श्रीकृष्ण वापस पृथ्वीलोक पर लौट आते है। अपने पुत्रों को वापस पाकर प्रसन्न ब्राह्मण श्रीकृष्ण की प्रशंसा करता है और अपने द्वारा कहे गए शब्दों के लिए क्षमा माँगता है। वहाँ से वापस लौटते समय अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना विराट स्वरूप दिखाने का आग्रह करता है, उनके आग्रह पर श्रीकृष्ण पहले दिव्य चछु प्रदान करते है, जिससे अर्जुन को उनका विराट स्वरूप देख पाता है। सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #tilak #krishna #shreekrishna #shreekrishnajeevani #krishnakatha