जय माता दी 🌷🌹
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कृष्ण वर्ण (काला/गहरा नीला रंग): माँ काली का रंग अनंत अंधकार और शून्यता का प्रतीक है। जिस प्रकार समस्त रंग काले रंग में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार सृष्टि का प्रत्येक तत्व अंततः उन्हीं में विलीन होता है।
त्रिनेत्र (तीन आँखें): उनके तीन नेत्र भूत, वर्तमान और भविष्य (काल के तीनों आयाम) तथा सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के प्रतीक हैं।
खुले और बिखरे केश: यह बंधन-मुक्ति और असीम स्वतंत्रता का प्रतीक है। प्रकृति को किसी भी सीमा में बांधा नहीं जा सकता।
बाहर निकली हुई रक्त-वर्ण जिह्वा: जब दैत्यों के संहार के समय उनका उग्र रूप शांत नहीं हो रहा था, तब भगवान शिव उनके मार्ग में लेट गए। शिवजी पर पैर पड़ते ही उनका क्रोध शांत हुआ और संकोच व लज्जा के कारण उनकी जीभ बाहर आ गई। यह राजसिक व तामसिक वृत्तियों (काम, क्रोध) पर नियंत्रण का भी प्रतीक है।
चार भुजाएँ (चतुर्भुज स्वरूप):
ऊपरी बायाँ हाथ: खड्ग (तलवार), जो अज्ञान, भ्रम और अहंकार को काटने वाले ज्ञान का प्रतीक है।
निचला बायाँ हाथ: कटा हुआ असुर-शीश, जो मानव के 'अहं' (Ego) के विनाश को दर्शाता है।
ऊपरी दायाँ हाथ: अभय मुद्रा, जो भक्तों को भय से मुक्त रहने का आश्वासन देती है।
निचला दायाँ हाथ: वरद मुद्रा, जो मोक्ष और आध्यात्मिक सिद्धि का वरदान देती है।
मुंडमाला: माँ के गले में 50 या 51 नरमुंडों की माला होती है, जो संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों (मातृकाओं) और ज्ञान की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व करती है।
कटे हाथों की करधनी: कमर में बंधे कटे हाथ यह दर्शाते हैं कि मनुष्य के समस्त संचित कर्म और कर्मफल अंततः माँ के चरणों में ही समर्पित होते हैं।
शिव पर चरण: 'शक्ति' जब 'शिव' (स्थिर चेतना) से मिलती है, तभी संतुलन बनता है। बिना शिव के शक्ति अनियंत्रित है, और बिना शक्ति के शिव शव के समान निष्क्रिय हैं।