Bhagwat Gita - Chapter 10 - Shloka 11 to 25 - Part 2
Spiritual Nandini
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Bhagwat Gita - Chapter 10 - Shloka 11 to 25 - Part 2
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भगवद्गीता अध्याय 10 – विभूति योग (भगवान का ऐश्वर्य) | श्लोक 11 से 25
भगवद्गीता के अध्याय 10 के श्लोक 11 से 25 में भगवान श्रीकृष्ण अपनी असीम कृपा, दिव्य विभूतियों और सर्वव्यापक ऐश्वर्य का वर्णन करते हैं।
श्लोक 11 में भगवान बताते हैं कि वे अपने भक्तों के हृदय में स्थित होकर ज्ञान के दीपक से अज्ञान के अंधकार को दूर करते हैं। जो भक्त प्रेमपूर्वक उनकी भक्ति करते हैं, उन पर भगवान विशेष कृपा करते हैं।
श्लोक 12 से 18 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र और सनातन दिव्य पुरुष स्वीकार करते हैं। वे भगवान से उनकी दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना करते हैं, ताकि वे निरंतर भगवान का स्मरण कर सकें।
श्लोक 19 से 25 में भगवान अपनी प्रमुख विभूतियों का वर्णन आरंभ करते हैं। वे बताते हैं कि वे सभी जीवों के हृदय में स्थित परमात्मा हैं और समस्त सृष्टि के आदि, मध्य तथा अंत हैं। आदित्यों में वे विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, नक्षत्रों में चंद्रमा, वेदों में सामवेद, इंद्रियों में मन और रुद्रों में भगवान शिव हैं। वे पर्वतों में मेरु, पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में कार्तिकेय तथा जलाशयों में समुद्र हैं।
मुख्य शिक्षाएँ:
भगवान अपने भक्तों के हृदय में स्थित होकर उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि के मूल कारण और परम सत्य हैं।
संसार की श्रेष्ठ एवं अद्भुत वस्तुओं में भगवान की विभूतियों का दर्शन किया जा सकता है।
भगवान की विभूतियों का चिंतन करने से हमारा स्मरण और भक्ति भाव बढ़ता है।
हरे कृष्ण! 🙏