ज्ञानी कर्म करता है, फिर भी बंधता क्यों नहीं? | भगवद्गीता 3.28
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ज्ञानी कर्म करता है, फिर भी बंधता क्यों नहीं? | भगवद्गीता 3.28
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ज्ञानी कर्म करता है, फिर भी बंधता क्यों नहीं? | भगवद्गीता 3.28
ज्ञानी कर्म करता है, फिर भी कर्म में बंधता क्यों नहीं?
भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 28 में भगवान श्रीकृष्ण कर्म, प्रकृति के तीन गुण और आसक्ति का एक गहरा रहस्य समझाते हैं।
पिछले श्लोक में हमने समझा कि अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है—“मैं कर्ता हूँ।” लेकिन अब प्रश्न उठता है—यदि ज्ञानी भी कर्म करता है, तो वह कर्म के बंधन में क्यों नहीं पड़ता?
इस वीडियो में हम समझेंगे:
• ज्ञानी कर्म करता हुआ भी बंधता क्यों नहीं?
• प्रकृति के तीन गुण कर्म कैसे करते हैं?
• ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में वास्तविक अंतर क्या है?
• कर्म में आसक्ति किस प्रकार बंधन बनाती है?
• “गुण गुणों में बरतते हैं” का क्या अर्थ है?
• क्या कर्म छोड़ना ही कर्मबंधन से बचने का उपाय है?
• भगवद्गीता 3.28 हमें अपने दैनिक जीवन में क्या सिखाती है?
भगवद्गीता का यह श्लोक हमें कर्म छोड़ने की नहीं, बल्कि कर्म और उसके पीछे छिपी आसक्ति को समझने की दिशा दिखाता है।
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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