Historical place Bhinmal।। ऐतिहासिक स्थल भीनमाल।।महाकवि माघ की नगरी।।Bhinmal#jalore#rajsthan
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भीनमाल की महिमा का वर्णन अनेकों अभिलेखों व प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। स्कंदपुराण श्रीमाल महात्म्य में भी इसके बारे में काफी जानकारी मिलती है। श्रीमाल का प्राचीन नाम गौतम आश्रम था, भगवती लक्ष्मी की कृपा से इस क्षेत्र का नाम श्रीमाल हुआ।
कालांतर में इसका नाम भीनमाल हो गया इसका विस्तार 5 योजन तक बताया गया है प्राचीन काल के अवशेष भीनमाल के चारों तरफ मरुस्थल में दबे हुए हैं और प्राचीन नगर के मोहल्ले और वास टूट टूट कर आज आसपास के गांवों में बदल गए।
भीनमाल के कई उत्थान और पतन लिखे गए हैं इतिहास व जनश्रुतियों के अनुसार यह नगर चार बार नष्ट हुआ बताते हैं कि इस इलाके में भीलों की बस्ती का हुआ करती थी इसलिए शुरुआत में इसका नाम भीललमाल हुआ करता था।उत्थान पतन की वजह से भीनमाल के कई नाम हुए जिसमें उसको आलमाल पुष्पमाल ,रत्नमाल श्रीमाल और भीनमाल आदि।
भीनमाल शताब्दियों तक पचिष्म भारत का सबसे बड़ा शहर था बल्कि शिक्षा व्यापार गणित ज्योतिष खगोल विज्ञान आदि का बहुत बड़ा केंद्र भी था बताते हैं कि इस नगर का विस्तार 36 मील करीब 60 किलोमीटर के इलाके में था नगर में हर तरफ जलाशय से तालाब बावड़ी आदि बने हुए थे।
पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर डिवीजन में दक्षिण में जालौर जिला है जालौर का उप जिला मुख्यालय भीनमाल है जोधपुर से रेल यात्रा पर 210 किलोमीटर और जालौर से इसकी 70 किलोमीटर दूर स्थित है।
इस नगर के पूर्व में कोटकास्ता और लेदरमेर दक्षिण में सांगी नदी पश्चिम में बाल समुद्र और उत्तर में जुंजाणी का जोड है।
यह नगर चार युगों में विभिन्न नामों से प्रसिद्धि प्राप्त करता हुआ इतिहास में अपना नाम लिखा हुआ आ रहा है सतयुग में श्रीमान ,त्रेता युग में रत्नमाल, द्वापर युग में फुलमाल और कलयुग में भीनमाल। भीनमाल में महान विद्वान ,संत, मुनि ,लेखक वैज्ञानिक, साहित्यकार, आचार्य एवं धनाढ्य वर्गों के जन्म और कर्मों की स्थली रहने का सौभाग्य ले चुकी है।
भीनमाल के सीखर के दौर में यहां संस्कृत के महाकवि माघ भी हुए उनका जन्म इसी शहर में हुआ उन्होंने शिशुपाल वध नामक महाकाव्य की रचना कर ख्याति हासिल की। कवि माघ के पिता वरमलात के मंत्री हुआ करते थे राजा वर्मालात ने भीनमाल शहर सोलंकी गोत्र और राजस्थान गुजरात कई जातियों की आराध्य देवी क्षेमंकरी माता की चरण पादुका के स्थान पर क्षेमंकरी मंदिर और प्रतिमा की स्थापना की जिसका उल्लेख बसंतगढ़ वर्तमान सिरोही जिले के शिलालेख में आज भी विद्यमान है।
इसी शहर में प्रसिद्ध ज्योतिष व खगोल विद ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मगुप्त सिद्धांत को यही रचा था।
प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु हेवनसांग ने अपनी भारत यात्रा वृतांत 642 में भीनमाल को (पी लो मो लो) को पश्चिमी भारत के दूसरे सबसे बड़े साम्राज्य गुर्जर देश की राजधानी बताया है। उसने अपने यात्रा वृतांत में यहां के जनजीवन, शासन, लोगों का रहन सहन ,धार्मिक जीवन से संबंधित कई महत्वपूर्ण बातें लिखी। यहां के राजा जनप्रिय तथा क्षत्रिय वंश से थे।
श्रीमाल नगर का विस्तार काफी लंबा और चौड़ा था उस समय के मोहल्ले और वास आज गांव बनकर भीनमाल से अत्यंत दूरी पर है।
कुसलापूरा राजपुरा राजीवकावास कलापुरा भीमपुरा खानपुर धनवाड़ा वणधर। यह सब गांव भीनमाल के मोहल्ले और वास थे जो आज इस शेर से पृथक होकर एक नए गांव के रूप में सृजित हो गए।
भीनमाल से 1955 में श्री रत्नचंदर अग्रवाल द्वारा उत्खनन करवाया गया उत्खनन के दौरान मृदभांड तथा शक क्षत्रपो के सिक्के मिले। मृदभांड पर विदेशी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। यहा से यूनानी दूहत्थी सुरई भी मिली जो यूनान के साथ व्यापारिक संबंधों को प्रकट करती है। खुदाई के दौरान यहां से रोमन शूरापात्र भी मिला है।
यहां हिंदू बौद्ध तथा जैन धर्म के अनुयाई रहा करते थे यह शहर वर्गाकार आकार में बसा हुआ था जिसके प्रवेश के कुल 84 द्वार थे यहा की जनता में ब्राह्मण लोग अधिक से भीनमाल के इतिहास के बारे में जानकारी बताने वाला दूसरा स्रोत खानदेश प्रबंध है जो मध्यकाल में लिखा गया था।
0 भीनमाल शहर में कई प्राचीन हिंदू व जैन मंदिर है जिसमें पार्श्वनाथ जैन मंदिर ,कीर्ति स्तंभ जैन मंदिर, महावीर स्वामी जैन मंदिर नाकोड़ा पार्श्वनाथ जैन मंदिर 72 जिनालय, बाफना वाडी।
यहां हिंदू देवी देवताओं के प्रमुख मंदिर नीम गोरिया क्षेत्रपाल मंदिर, वाराह श्याम मंदिर ,चंडीनाथ महादेव मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, क्षेमंकरी माताजी मंदिर ,महालक्ष्मी मंदिर ,संतोषी माता मंदिर, चंडीनाथ बावड़ी, गणेश मंदिर ,गायत्री माता मंदिर, फापरिया हनुमान जी मंदिर आदि।