Перейти к содержимому

नरसिंह पावरफुल ताबीज कवच | कवच जड़ी ओर मंत्र प्रयोग | कवच जड़ी की पहचान लाने की विधि मंत्र

Sankat nashak2.0

0:00 / 0:00

नरसिंह पावरफुल ताबीज कवच | कवच जड़ी ओर मंत्र प्रयोग | कवच जड़ी की पहचान लाने की विधि मंत्र

20 113 просмотров · 1 год назад
Sankat nashak2.0
133 тыс. подписчиков
20 113 просмотров · 1 год назад
नरसिंह पावरफुल ताबीज कवच | कवच जड़ी ओर मंत्र प्रयोग | कवच जड़ी की पहचान लाने की विधि मंत्र #sankatnashak2 #devatvasiddhi #shatrunashak #pretbadha #narsinghbhagwan #narsimha #कवच #kavch निम्न मंत्रों का प्रयोग कर अपना सुरक्षा कवच जड़ी डाल कर बना सकते है और संपूर्ण सिद्ध कवच ताबीज बना हुआ मांगने के लिए संपर्क कर सकते है संपर्क....... https://t.me/sankatnashak प्रायवेट में नबर छोड़ दे समय मिलते ही में कॉल करुगा संपर्क....... प्राइवेट चेट के लिए लिंक पर जाएं https://t.me/Ramkuti70 मंत्र : ॐ नमो महा नरसिंहाय-सिंहाय सिंह-मुखाय विकटाय वज्रदन्त-नखाय माम् रक्ष-रक्ष मम शरीरं नख-शिखा पर्यन्तं रक्ष रक्षां कुरु-कुरु मदीय शरीरं वज्रांगम कुरु-कुरु पर-यंत्र, पर-मंत्र, पर-तंत्राणां क्षिणु-क्षिणु खड्गादि-धनु-बाण-अग्नि-भुशंडी आदि शस्त्राणां इंद्र-वज्रादि ब्रह्मस्त्राणां स्तम्भय-स्तम्भय,जलाग्नि-मध्ये रक्ष गृह-मध्ये ग्राम-मध्ये नगर-मध्ये वन-मध्ये रण-मध्ये श्मशान-मध्ये रक्ष-रक्ष,राज-द्वारे राज-सभा मध्ये रक्ष रक्षां कुरु-कुरु, भूत-प्रेत-पिशाच देव-दानव-यक्ष-किन्नर-राक्षस, ब्रह्म-राक्षस, डाकिनी-शाकिनी-मौन्जियादि अविधं प्रेतानां भस्मं कुरु-कुरु भो:अत्र्यम गिरोसिंही-सिंहमुखी ज्वल ज्ज्वाला जिव्हे कराल-वदने मां रक्ष-रक्ष, मम शरीरं वज्रमय कुरु-कुरु दश-दिशां बंध-बंध वज्र-कोटं कुरु-कुरु आत्म-चक्रं भ्रमावर्त सर्वत्रं रक्ष रक्ष सर्वभयं नाशय-नाशय व्याघ्र -सर्प-वराह-चौरदिन बन्धय-बन्धय, पिशाच-श्वान दूतान्कीलय-कीलय हुम् हुम् फट। ॐ नमो नृसिंहाय ज्वाला मुखाग्निनेत्राय शङ्ख चक्रगदा प्रहस्ताय । योग रूपाय हिरण्यकशिपु च्छेदनान्त्र माला विभूषणाय,, हन हन दह दह वच वच रक्ष वो नृसिंहाय पूर्वदिशां बन्ध बन्ध, रौद्र नृसिंहाय दक्षिणदिशां बन्ध बन्ध, पावन नृसिंहाय पश्चिमदिशां बन्ध बन्ध, दारुण नृसिंहाय उत्तरदिशां बन्ध बन्ध, ज्वाला नृसिंहाय आकाशदिशां बन्ध बन्ध, लक्ष्मी नृसिंहाय पातालदिशां बन्ध बन्ध, कः कः कम्पय कम्पय आवेशय आवेशय अवतारय अवतारय, शीघ्रं शीघ्रम् ॥ सर्वतो रक्ष रक्ष रक्ष नृसिंहाय हूं फट उग्रा में ह्रदय:कंठ: पातु महेश्वरी उज्ज्टा नायने पातु कर्ण च विंध्यवासिनी ललाटये विशाखा पातु शाकनी राकनी तथा लकंकनी बाहु युग्म में पदो दिक्कार वासनी अन्यान्य प्रत्या गानी शोड्सा पातु सन्त तम धनाद भोगन्द आयु अरोग्य कारकम मोक्ष चम विघ्न नशान च नर नारी बस करम ॐ नमो नृसिंहाय कपिल जटाय मम सर्व रोगान् बन्ध बन्ध, सर्व ग्रहान बन्ध बन्ध, सर्व दोषादीनां बन्ध बन्ध, सर्व वृश्चिकादिनां विषं बन्ध बन्ध, सर्व भूत प्रेत, पिशाच, डाकिनी शाकिनी, यंत्र मंत्रादीन् बन्ध बन्ध, कीलय कीलय चूर्णय चूर्णय, मर्दय मर्दय, ऐं ऐं एहि एहि, मम येये विरोधिन्स्तान् सर्वान् सर्वतो हन हन, दह दह, मथ मथ, पच पच, चक्रेण, गदा, वज्रेण भष्मी कुरु कुरु स्वाहा। ॐ उग्राय उग्र वीराय उग्र विकटाय उग्र वज्राय वज्र देहिने रुद्राय रुद्र घोराय भद्राय भद्रकारिणे ॐ ज्रीं ह्रीं नृसिंहाय नमः स्वाहा !! ॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकश्यप वक्षस्थल विदारणाय त्रिभुवन व्यापकाय भूत-प्रेत पिशाच डाकिनी-शाकिनी कालनोन्मूलनाय मम शरीरं स्तम्भोद्भव समस्त दोषान् हन हन, शर शर, चल चल, कम्पय कम्पय, मथ मथ, ह्रीम ह्रीम हूं हूं फट फट ठः ठः यही यही रुद्र आज्ञा पायत स्वहा ॐ नमो भगवते भो भो सुदर्शन नृसिंह ॐ आं ह्रीं क्रौं क्ष्रौं हुं फट्। ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं ह्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रौं नृसिंहाय नमः स्वाहा। ओम नमो नरसिहाय कपिल जटाय सर्व रोगान असुर-दैत्य-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच कूष्माण्ड सिद्ध-योगिनी-डाकिनी-शाकिनी-स्कन्दग्रहान् उपग्रहान्नक्षत्र ग्रहांश्चान्या हन हन पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय विद्रावय विद्रावय चूर्णय चूर्णय शङ्खेन चक्रेण वज्रेण शूलेन गदया मुसलेन हलेन भस्मीकुरु कुरु स्वाहा । ॐ ज्रीं ह्रीं नृसिंहाय नमः ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय ज्वालामालिने दीप्तदंष्ट्राय अग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतविनाशाय सर्वज्वर विनाशाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा ⁠ 'ॐ नमो भगवते सुदर्शनाय भो भो सुदर्शन दुष्टं दारय-दारय दुरितं हन-हन पापं दह-दह, रोगं मर्दय-मर्दय, आरोग्यं कुरु कुरु, ॐ ह्रां ह्रां ह्रीं ह्रीं ह्रूं ह्रूं फट् फट् दह-दह हन-हन भीषय-भीषय स्वाहा।' "ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥" ऊँ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रूं क्ष्रें क्ष्रों क्ष्रः भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रें भ्रों भ्रः ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रॊं ह्रः घ्रां घ्रीं घ्रुं घ्रें घ्रों घ्रः श्रां श्रीं श्रूं श्रें श्रों श्राः । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्नचक्रः प्रचोदयात्