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रामानंद सागर कृत श्री कृष्ण भाग 53 - गुरु सन्दीपनि के मृत पुत्र को वापस लाना

Tilak

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रामानंद सागर कृत श्री कृष्ण भाग 53 - गुरु सन्दीपनि के मृत पुत्र को वापस लाना

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Watch This New Song Bhaj Govindam By Adi Shankaracharya :    • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र...   तिलक की नवीन प्रस्तुति "श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम्" अभी देखें :    • श्री आदि शंकराचार्य कृत भज गोविन्दम् | प्र...   _________________________________________________________________________________________________ बजरंग बाण | पाठ करै बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की | जय श्री हनुमान | तिलक प्रस्तुति 🙏 भक्त को भगवान से और जिज्ञासु को ज्ञान से जोड़ने वाला एक अनोखा अनुभव। तिलक प्रस्तुत करते हैं दिव्य भूमि भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थानों के अलौकिक दर्शन। दिव्य स्थलों की तीर्थ यात्रा और संपूर्ण भागवत दर्शन का आनंद। Watch the video song of ''Darshan Do Bhagwaan'' here -    • दर्शन दो भगवान | Darshan Do Bhagwaan | Sur...   Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 53 - Slaughter of Panchajanya by Shri Krishna. Refund of refund. गुरुकुल में शिक्षा प्राप्ति तक श्रीकृष्ण लीला का प्रथम भाग समाप्त होता है। यह लीलाएं भक्तों को रिझाने के लिये थीं। वह ऐसे पूर्ण अवतार हैं जिन्होंने हर कदम पर यह घोषणा की है कि वह स्वयं भगवान हैं। चाहे यह कंस के कारागार में उनका अवतरित होकर देवकी के गर्भ में स्थापित होना हो अथवा पूतना राक्षसी का वध। चाहे यह बकासुर का वध हो या कालिया नाग का मर्दन। गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाना हो या ब्रह्माजी का मान मर्दन। इन लीलाओं को करके उन्होंने धरती के प्राणियों को जता दिया कि वह स्वयं भगवान हैं। अपने मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के दर्शन करा कर उन्होंने अपनी माता यशोदा को भी अपने अलौकिक होने का भान दिया। राधा के साथ प्रेमलीला करने वाले कृष्ण अब जीवन का दूसरा पहलू दिखाने जा रहे हैं। वह धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने के लिये युद्धभूमि में उतरने जा रहे हैं। यह उनके अवतार लेने का दूसरा कारण है जिसे अब वे पूर्ण करने जा रहे हैं। श्रीकृष्ण अब मुरली छोड़ सुदर्शन चक्र धारण करने जा रहे हैं। इसके लिये कंस के बाद अब उसके श्वसुर जरासंध की बारी है। जरासंध अपने जमाई कंस की मौत का प्रतिशोध लेने के लिये घोषणा करता है कि मैं यमुना के जल को यदुवंशियों के रक्त से लाल कर दूँगा। वह अपनी विशालकाय सेना के साथ मथुरा की ओर कूच करता है। मार्ग में मद्रदेश के राजा शल्य की सेना और उसके कई अन्य मित्र राजाओं की सेनाएं भी उससे मिलती रहती हैं। अक्रूर के गुप्तचर राजा शूरसेन को जरासंध के मथुरा की ओर बढ़ने की सूचना देते हैं। शूरसेन सभासदों की आपात् बैठक बुलाते हैं। वह कहते हैं कि वर्षों कारागार में रहने के कारण मथुरा नरेश उग्रसेन के अंग शिथिल पड़ चुके हैं। वे जरासंध का मुकाबला नहीं कर पायेंगे। इसलिये मथुरा की रक्षा के लिये हमें कुछ करना होगा। तब उनका एक मंत्री पड़ोसी राज्यों से सहायता माँगने का परामर्श देता है। एक अन्य मंत्री का कथन है कि पड़ोसी राजा बाणासुर और भामासुर कंस के मित्र थे। इसलिये वह कभी महाराज उग्रसेन का साथ नहीं देंगे बल्कि उनके पराजित होने पर वह जरासंध के साथ मथुरा लूटने में शामिल हो जायेंगे। एक अन्य मंत्री जरासंध से संधि कर लेने का परामर्श देता है। तब श्रीकृष्ण क्षत्रिय की भांति युद्ध करने की बात कहते हैं और सबके मन से भय निकालने के लिये भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हैं कि उन्होंने केवल कुछ वानरों को साथ लेकर त्रिलोक विजयी रावण को अपनी वीरता के बलबूते पराजित कर दिया था। श्रीकृष्ण के वचन सुनकर सभी अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल लेते हैं और मथुरा की रक्षा का संकल्प लेते हैं। इसके बाद महामंत्री महाराज शूरसेन को सुझाव देता है कि आपकी पुत्री कुन्ती हस्तिनापुर की रानी है। कौरव साम्राज्य में भीष्म पितामह और आचार्य द्रोण जैसे महारथी हैं। हमें उनसे सैन्य सहायता मिल सकती है। महाराज शूरसेन कहते हैं कि मेरे दामाद महाराज पाण्डु की मृत्यु हो चुकी है और मेरी पुत्री कुन्ती विधवा हो चुकी है इसलिये मुझे नहीं पता कि उसका कितना प्रभाव शेष है किन्तु फिर भी आशा की जा सकती है कि महाराज धृतराष्ट्र हमारी सहायता अवश्य करेंगे। महाराज शूरसेन अक्रूर को हस्तिनापुर जाने का आदेश देते हैं। श्रीकृष्ण अक्रूर जी से कहते हैं कि वह हस्तिनापुर में उनकी बुआ कुन्ती से अवश्य मिलें और उनके पाँचों पुत्रों का भी हालचाल लेकर आयें। पाण्डवों को यह सन्देश भी दें कि पिता की मृत्यु के बाद वे स्वयं को कमजोर न समझें। कहना कि उनकी रक्षा का भार अब कृष्ण पर है। हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र की राजसभा में महामंत्री विदुर सूचना देते हैं कि मथुरा के सेनापति अक्रूर राजदूत के रूप में कोई सन्देश लेकर आये हैं और महाराज धृतराष्ट्र से मिलना चाहते हैं। किन्तु शकुनि कुटिल चाल खेलता हुआ धृतराष्ट्र को बहकाता है कि सम्भवत मथुरा वालों ने पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर को राजसिंहासन सौंपे जाने की माँग उठाने के लिये अपना राजदूत भेजा है क्योंकि पाण्डु उनके जमाई थे। शकुनि की बातों में आकर धृतराष्ट्र अक्रूर से मिलना कुछ समय के लिये टालना चाहते हैं। उसी समय भीष्म पितामह टोकते हुए कहते हैं कि राजनीति की एक मर्यादा होती है। राजदूत को इस प्रकार तिरस्कारपूर्वक मिलने से मना नहीं किया जा सकता। फिर गुरु द्रोणाचार्य और गुरु कृपाचार्य के होते हुए महाराज को कोई अन्देशा नहीं रखना चाहिये। यह सुनकर धृतराष्ट्र अक्रूर को राजसभा में लाने की अनुमति देते हैं। In association with Divo - our YouTube Partner #SriKrishna #SriKrishnaonYouTube