Lord Shree Krishna's Born | श्री कृष्ण का जन्म - मथुरा की कारागार में दिव्य अवतार | @AxomFairyWorld
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श्री कृष्ण का जन्म — मथुरा की कारागार में दिव्य अवतार
बहुत समय पहले मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन का शासन था। उनके पुत्र कंस ने सत्ता के लालच में अपने ही पिता को बंदी बनाकर मथुरा का राजा बन गया। कंस अत्यंत शक्तिशाली और कठोर शासक था। उसके अत्याचार से मथुरा की प्रजा भयभीत रहती थी।
एक दिन कंस अपनी प्रिय बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ करके उन्हें विदा कर रहा था। तभी आकाशवाणी हुई—
“हे कंस! जिस देवकी को तुम इतने प्रेम से विदा कर रहे हो, उसी देवकी की आठवीं संतान तुम्हारे अंत का कारण बनेगी।”
आकाशवाणी सुनकर कंस भयभीत हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। कंस ने उनके सामने जन्म लेने वाली प्रत्येक संतान से अपने जीवन को खतरा समझा और उनके बच्चों को अपने सैनिकों के हाथों मरवा दिया।
समय बीतता गया। देवकी की सातवीं संतान के समय भगवान की दिव्य शक्ति से वह गर्भ रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया। वही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए।
अब देवकी आठवीं बार गर्भवती हुईं। पूरी मथुरा में एक अनजाना भय और रहस्यमय शांति फैल गई। कारागार के भीतर देवकी और वसुदेव भगवान से प्रार्थना करते रहे।
फिर वह पवित्र रात आई।
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी। आधी रात का समय था। बाहर घने बादल छाए हुए थे। तेज वर्षा हो रही थी और यमुना नदी उफान पर थी। मथुरा की गलियां सुनसान थीं।
कारागार के भीतर देवकी प्रसव पीड़ा में थीं। वसुदेव उनके पास बैठकर उन्हें साहस दे रहे थे।
अचानक कारागार में अद्भुत प्रकाश फैल गया। ऐसा लगा मानो अंधकार के बीच स्वयं सूर्य का तेज प्रकट हो गया हो।
और उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया।
उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य था। उनके मुख पर अद्भुत तेज था और वातावरण में अलौकिक शांति छा गई। देवकी और वसुदेव ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया।
भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे पृथ्वी पर धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अवतरित हुए हैं।
कुछ समय बाद भगवान ने नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया।
वसुदेव ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा। तभी कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गए। जिन सैनिकों को पहरे पर लगाया गया था, वे गहरी नींद में सो गए।
वसुदेव ने बालक कृष्ण को लेकर कारागार से बाहर कदम रखा। बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही थी। उन्हें यमुना पार करके गोकुल जाना था, जहां नंद और यशोदा रहते थे।
वसुदेव यमुना के किनारे पहुंचे। नदी उफान पर थी, लेकिन जैसे ही उन्होंने कृष्ण को लेकर पानी में कदम रखा, यमुना का जल उनके लिए मार्ग बनाने लगा।
उसी समय भगवान शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बालक कृष्ण और वसुदेव को वर्षा से बचाया।
वसुदेव सुरक्षित रूप से यमुना पार करके गोकुल पहुंचे। नंद भवन में उस रात यशोदा ने भी एक बालिका को जन्म दिया था।
वसुदेव ने श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उस बालिका को अपने साथ लेकर मथुरा की कारागार में लौट आए।
जैसे ही वसुदेव कारागार में पहुंचे, दरवाजे फिर से बंद हो गए और पहरेदार जाग उठे। कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला।
वह तुरंत कारागार में पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने उस बालिका को उठाया, वह उसके हाथ से निकलकर आकाश में दिव्य रूप धारण कर गई।
उस दिव्य शक्ति ने कंस को चेतावनी दी—
“जिससे तुम्हें भय है, वह जन्म ले चुका है और सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है।”
कंस भय और क्रोध से कांप उठा।
उधर गोकुल में नंद के घर आनंद छा गया था। किसी को पता नहीं था कि उनके घर आया वह बालक साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे।
गोकुल में उत्सव मनाया जाने लगा। घर-घर दीप जलाए गए, मंगल गीत गाए गए और नंद बाबा ने लोगों में मिठाइयां बांटीं।
इस प्रकार अंधकार भरी उस आधी रात में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ—और उनके जन्म के साथ ही धर्म, प्रेम और आशा की एक नई कहानी शुरू हुई।
संदेश:
जब अधर्म बढ़ता है और संसार में अन्याय का अंधकार छा जाता है, तब धर्म और सत्य की रक्षा के लिए दिव्य शक्ति का प्राकट्य होता है। श्रीकृष्ण का जन्म हमें विश्वास, धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
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