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पानी था… फिर भी प्यासे क्यों? | “पानी सामने था, लेकिन अधिकार नहीं था” | डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर

Nitin Dhivar. जय भीम जय शिवराय 💙

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पानी था… फिर भी प्यासे क्यों? | “पानी सामने था, लेकिन अधिकार नहीं था” | डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर

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पानी सामने था… लेकिन अधिकार नहीं था। कुछ लोग सवाल करते हैं—अगर हजारों वर्षों तक बहुजन समाज के लोगों को पानी नहीं मिलता था, तो वे जीवित कैसे रहे? लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि पानी था या नहीं। असली सवाल है—पानी होते हुए भी क्या सभी लोगों को सार्वजनिक कुओं, तालाबों और जलस्रोतों से समान रूप से पानी लेने का अधिकार था? इस डॉक्यूमेंटरी में हम इसी ऐतिहासिक प्रश्न को समझने की कोशिश करेंगे। महाराष्ट्र सहित भारत के कई क्षेत्रों में जाति के आधार पर सामाजिक भेदभाव के कारण तथाकथित अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों को सार्वजनिक जलस्रोतों के उपयोग में बाधाओं का सामना करना पड़ता था। यह पूरे भारत में हर जगह एक जैसी स्थिति नहीं थी, लेकिन सार्वजनिक जलस्रोतों तक समान पहुँच का प्रश्न सामाजिक न्याय के संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। सन उन्नीस सौ तेईस में सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग से संबंधित महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल हुई। फिर सन उन्नीस सौ सत्ताईस में महाड़ का ऐतिहासिक संघर्ष सामने आया। बीस मार्च, सन उन्नीस सौ सत्ताईस को डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर के नेतृत्व में चवदार तालाब से पानी लेकर समान अधिकार का दावा किया गया। यह केवल पानी का प्रश्न नहीं था। यह समानता, आत्मसम्मान और मानव अधिकारों का प्रश्न था। इस डॉक्यूमेंटरी में जानिए महाड़ के संघर्ष की कहानी और समझिए कि “पानी सामने था… लेकिन अधिकार नहीं था” का वास्तविक ऐतिहासिक अर्थ क्या है। वीडियो पसंद आए तो Like, Share और Subscribe जरूर करें। जय भीम!