Перейти к содержимому

आत्मन् सोच तज झूठा | AATMAN SOCH TAJ JUTHA | उत्तम सत्य | आत्मन् धर्म सौरभ | दशलक्षण महापर्व भजन

Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji

0:00 / 0:00

आत्मन् सोच तज झूठा | AATMAN SOCH TAJ JUTHA | उत्तम सत्य | आत्मन् धर्म सौरभ | दशलक्षण महापर्व भजन

174 просмотра · 1 ч назад
Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
30,6 тыс. подписчиков
174 просмотра · 1 ч назад
आत्मन्! सोच तज झूठा, शरण कोई नहीं मुझको । जरूरत ही नहीं तुझको, स्वयं परिपूर्ण लख खुद को॥ टेक॥ निजी अस्तित्व से जीता, नहीं कोई नाश कर सकता। अहो! वस्तुत्व शक्ति से, परिणमन भी स्वयं होता ॥ तुझे चिन्ता पड़ी है क्या? परणति ही करे खुद को ॥ 1॥ नहीं इहलोक-परलोक, नहीं है वेदना कोई। अरक्षा और अगुप्ति, नहीं होवे कभी चोरी।। नहीं कुछ भी कदा होवे, सप्त भय है नहीं मुझको।। 2॥ अहो! अक्षय तेरा वैभव, सहज सुख सिंधु लहरावे। नहीं कर्मादि, रागादिक, ज्ञान में ज्ञान ही आवे।। ज्ञानमय रूप ही तेरा, ज्ञान में भासता तुझको।। 3॥ स्वयं ही तू प्रभु तेरा, तेरी महिमा है सर्वोत्तम। नहीं बनना, नहीं होना, सहज ही तू है लोकोत्तम।। नहीं शंका, नहीं गुंजाइश, सहज सुखमय लखो खुद को ॥। 4॥ तेरी मुक्ति नहीं पर में, चले युक्ति नहीं पर में। तेरा सर्वस्व स्व में ही, नहीं कुछ भी अरे पर में। दैन्य वृत्ति तेरी झूठी, सदा ही प्रभु लखो खुद को।। 5॥ तेरा गुरु है नहीं बाहर, अहो! तू ही परम गुरु है। अनादर क्यों करे निज का, निरवलम्बी परम प्रभु है।। सहज निरपेक्ष ध्रुव ज्ञायक, मात्र ज्ञायक समझ खुद को ।।6।। (सहजपथ संग्रह, पृष्ठ 65) ------------------------------------------- रचयिता - श्रद्धेय ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’ स्वर - स्वयं जैन, सीहोर सहस्वर - अध्यात्म परिवार, राजनांदगाँव प्रस्तुतकर्ता - आत्मन् परिवार, सम्मेदशिखरजी