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ग़ज़ल- 'त्यारा सौं' | GIRISH SUNDRIYAAL | TYARA SAU | PAHADIWOOD | कलश गढ़वाळि कवि सम्मेलन | S01E01 |

Pahadiwood Productions

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ग़ज़ल- 'त्यारा सौं' | GIRISH SUNDRIYAAL | TYARA SAU | PAHADIWOOD | कलश गढ़वाळि कवि सम्मेलन | S01E01 |

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ग़ज़ल- 'त्यारा सौं' कवि- गिरीश सुंदरियाल Presentation- Pahadiwood Presentation Recorded by- Saurabh Jaggi, Prashant Uniyal Pahadiwood is dedicated to create rich music of different folks and conserve literature from every part of India. We are starting this objective from our beautiful North-Indian state Uttarakhand. आप तै हाल मा रिलीज हमारु यु गीत भी अवश्य पसंद आलु। चल रे दगड़्या-    • Chal Re Dagdya | चल रे दगड़्या | Pahadiwoo...   कवि सम्मेलन श्रृंखला: Season 1 S01E02 : कविता- "गाजर घास" मुरली दीवान-   • कविता- 'गाजर घास' | MURLI DIWAN | मुरली दी...   Pahadiwood's Social media links- You can connect with us! Instagram-   / pahadiwood   Facebook-   / pahadiwood   Twitter-   / pahadiwood   त्यारा सौं या बात कैमा नी बताण मिन तेरी धमेलि उंद फाँस खाण| तेरि लटुलि भिंटुलि दगड़ि फूँदा सी मिन सुमरे-सुमरेकि ब्वटेई जाण| आँखि छन कि गैरि ढन्ड ताल तुलबुल मिन तौं आँख्यूं मा सदान्यू डूबी जाण| मेरा दिल मा तेरु राज छ हे राजुला यो राज त्वे सणि मिन कनै बिंगाण| सौं कति बि खा तु भौं हे मेरि माया की तिन अपणि गैल्याण्यूं मा सबी पुर्याण| सुद-बुद हर्ची छ मि स्यो बौळ्या बण्यू छौं हौरि तमासु माया को तिन क्या उर्याण| जब वो ऐना, ऐना लैना क्या खुणि 'गिरीश' जब अन्वार आँख्यूं मा द्यखण दिखाण| Welcome to Pahadiwood! This is our aim to create the stuff, that could fill you with joy and inspiration. If our efforts can make the change, means we are in the right direction. Warm Regards! Pahadiwood गढ़वाली भाषा मा साहित्य को सृजन सभी विधाओं मा हूणों च जो कि ईं भाषा को भल्यार का वास्ता सुखद संकेत च। काव्य मा अनेक विधा छन अर लगभग सभी विधाओं मा गढ़वाली साहित्य रचै गै अर रचेणू बि च , एक विधा गजल भी चा अर गजल पर भी गढ़वाली लिख्वारोंन अपणी कलम खूब चले। गजल को मुख्य या प्राचीन विषय माया, प्रेम, महिलाओं को सौंदर्य बखान रै, भले आजै समय मा गजल हर विषय पर रचै अर रचैणी च । गिरीश जीन भी गजल को पुश्तेनी विषय पर भी खूब कलम चलै। माया की बात महिला की उपस्थिति का बिना अधूरी हून्दी, जब महिलाओं की बात ह्वा अर वैमा श्रृंगार की छुई ना हो इन्न त ह्वे ही नि सकद अर गिरीश जी का गीत गजल बिना श्रृंगार रस का कन्नक्वे ह्वे सकदी, बिना दुखो का आप सुख को अनुभौ नि कैर सकदी, माया मा जख द्वी दिलो को मेल - सयोंग हूंद त वखि वियोग को हूणों लाजमी च। कबि कबि माया एक तरफा बि होंन्दी, वैतै एक शेर कुछ ये तरीका से लिखी गिरीश जीन कि: "मिन त्यारा स्वीणों मा औण तु बुलौ या नि बुलौ त्वे बडुळि बि लगौण तू भुलौ या नि भुलौ।" गिरीश जी अपणी गजलों का माध्यम से जख प्रेम, राजनीति सामाजिक चेतना की बात करदी वखि वो नै छिवाली तै यथार्थ से मिलाण मा ऊको समझाण मा बि पिछनै नि रैन्दी तबी त वो लेखदी कि: "ह्यूं सि जमण प्वाड़लो, घ्यू सि गळण प्वाड़लो जीणु छ त दीन-दुन्या दगड़ रळण प्वाड़लो।" गिरीश जीन अपणी गजलों मुहावरों को खूब प्रयोग कर्यो च जो कि गजल या शेर तै व्यापक विस्तार दे दिन्दी। ग़ज़ल "पंदरा-पच्चीस ह्वेगे वा" का हरेक शेर मा मुहावरों प्रयोग चः "पंदरा-पच्चीस ह्वेगे वा चार सौ बीस ह्वेगे वा। मुल हैऔसी हेरी वीन बीसौ उन्नीस ह्वेगे वा।" लेख: 'साथी' गोविंदराम पोखरियाल गिरीश सुन्दरियाल- अन्वार (कविता) हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट देहरादून सन् 2006 पृ० 88; मौळ्यार (गीत), हिमालय लोेक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, सन् 2008, पृष्ठ 62; असगार (नाटक), समय साक्ष्य, देहरादून, 2010, पृ. 200; कब खुललि रात (नाटक), ह्वळी स्वाँ (गीति काव्य), उड़ि जौं अगास (गीत), समय साक्ष्य, देहरादून; कुटमुणी (बाल कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2018, पृ. 86; अंग्वाळ सौ सालै कविता, (संयुक्त संपादन) हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, 2012, पृ. 350; हुंगरा 100 सालै कथा जात्रा (संयुक्त संपादन), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 484। साभार: रमाकांत बेंजवाल (गढ़वाली भाषा एवं साहित्य के लेखक और उनका साहित्य)|