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USA Retreat - विपश्यना साधना कैसे करें? - Day 2

Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma

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USA Retreat - विपश्यना साधना कैसे करें? - Day 2

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Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma
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विपश्यना साधना के चरण-दर-चरण निर्देश चरण 1: पूर्व-तैयारी और अधिष्ठान (संकल्प) ध्यान की शुरुआत करने से पहले (जैसे पिछली रात को सोने से पहले) एक 'अधिष्ठान' (दृढ़ संकल्प) करें कि आपको ध्यान की किस अवस्था में जाना है, जैसे कि आभासार (द्वितीय ध्यान, जहां विपश्यना की जा सकती है)। ध्यान रहे कि यह अवस्था तभी प्राप्त की जा सकती है जब आपने अपने 10 अकुशल कर्मों को छोड़ने पर काम किया हो। चरण 2: पांच निवारणों को दूर करना सुबह जागने के बाद, बिस्तर से उठने से पहले ही अपने मन की स्थिति का अवलोकन करें। मन में आने वाली बाधाओं या पांच निवारणों (कामच्छंद, व्यापाद, थिन-मिद्ध, उद्धच्च, कुकुच्च) को बिस्तर पर ही समाप्त करें। उदाहरण के लिए, आलस्य (थिन-मिद्ध) होने पर आंखों पर पानी डालें, बेचैनी (उद्धच्च) होने पर सांसों को देखें ताकि बेचैनी दूर हो, और यदि व्याकुलता (कुकुच्च) हो तो देखें कि कहीं कोई शील तो नहीं टूटा है। चरण 3: दैनिक क्रियाओं में सति और इंद्रिय संवर बिस्तर से उठने के बाद की दैनिक गतिविधियों (जैसे ब्रश करना, शौचालय जाना) में सति-संपजन्य (mindfulness and clear comprehension) और इंद्रिय संवर (guarding the senses) बनाए रखें। बुद्धघोष के अनुसार चार प्रकार के संपजन्य का पालन करें: सार्थक (purposeful), सप्पाय (suitable), गोचर (domain of meditation), और असम्मोह (non-delusion - यह जानना कि यह शरीर मेरा नहीं है)। चरण 4: शारीरिक अंगों का अवलोकन (कायगता सति) शरीर (काय) की स्थिति को जानें और समझें (पजाना)। बुद्ध धम्म में अंगों की 'स्कैनिंग' (scanning) करने का कोई विधान नहीं है; बल्कि पूरी काय में उठने वाली वेदना (सुख, दुख, या अदुख-असुख वेदना), संज्ञा (perception) और वितर्क (thoughts) का अवलोकन करना होता है। चरण 5: चलने (Walking) से शुरुआत करना सुबह उठने के बाद सीधे ध्यान की मुद्रा में बैठने के बजाय आधा या एक घंटे टहलने (walking) जाएं। सीधे बैठने से सुस्ती आ सकती है। शारीरिक मुद्राओं (ईरिय पथ) का क्रम हमेशा स्थूल से सूक्ष्म की ओर होना चाहिए: पहले चलना, फिर खड़े होना, फिर बैठना और अंत में लेटना। बुद्ध धम्म में आंखें बंद करने की नहीं, बल्कि खुली आंखों से इंद्रिय संवर करने की शिक्षा दी गई है। चरण 6: चार महाभूतों का दर्शन (धातु मनसिकार) जब आप ध्यान की द्वितीय अवस्था (आभासार) में स्थिर हो जाएं, तब विपश्यना के मुख्य विषय पर आएं। इस शरीर को चार महाभूतों—पटवी (पृथ्वी), आपो (जल), तेजो (अग्नि) और वायो (वायु) के रूप में देखें। इन तत्वों को अपने भीतर (अज्झत्त) और बाहर (बहिद्ध) दोनों रूपों में जांचें (जैसे बाहर जो पानी या गर्मी है, वही शरीर के भीतर भी है)। पृथ्वी धातु को समझने के लिए कठोरता/कोमलता (hardness/softness) जैसी वैचारिक बातों में उलझने के बजाय सीधे धातु को पहचानें। चरण 7: विपश्यना के पांच नियमों को शरीर पर घटित होते देखना अब शरीर (काय) पर इन पांच मुख्य लक्षणों को घटित होते देखें: अनिच्च (Anicca): दिन-रात और समय के साथ शरीर का लगातार बदलना। उच्छादान (Ucchadana): शरीर के रख-रखाव (नहलाना, खिलाना, साफ-सफाई) की निरंतर आवश्यकता। परिमर्दन (Parimaddana): शारीरिक दबाव के कारण निरंतर मुद्राओं (postures) को बदलना (जैसे बैठने पर दबाव या गर्मी बढ़ने से स्थिति बदलना)। भेदन (Bhedana): शरीर का लगातार टूटना या क्षय होना (जैसे पसीना आना, मृत त्वचा का झड़ना, बाल गिरना)। विधंसन (Vidhamsana): अंततः इस पूरे शरीर का विघटित होकर पूरी तरह से नष्ट हो जाना। चरण 8: विज्ञान (Consciousness) का अवलोकन यह देखें कि विज्ञान (चेतना) ने इन पांच धातुओं को वैसे ही बांध रखा है जैसे धागा मणियों को बांधता है। यह विज्ञान भी 'मेरा' नहीं है। लौकिक रूप से विज्ञान ही विभिन्न सांसारिक नामों (जैसे सुरेश, अंजना) या भूमिकाओं (जैसे डॉक्टर, पति-पत्नी, गृहस्थ-संन्यासी) को सच मान लेता है। विपश्यना में अलौकिक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि यहाँ कोई व्यक्ति नहीं है, केवल धातुएं और विज्ञान हैं। मुख्य अंतर्दृष्टि (Key Insights) शरीर की उत्पत्ति और परायापन: यह शरीर माता-पिता के लैंगिक संबंधों और भोजन (ओदान कुम्मास - जैसे दाल, चावल, सब्जी) के कारण बढ़ा है। इसलिए यह हमारा अपना नहीं है बल्कि माता-पिता और प्रकृति द्वारा दिया गया एक ढांचा है। आंखें बंद करने का भ्रम: केवल एक कमरे में कुशन लेकर आंखें बंद करके बैठने से आश्रव (मानसिक विकार) समाप्त नहीं होते। सच्चे इंद्रिय संवर का अर्थ है खुली आंखों के साथ सति-संपजन्य में रहना और राग-द्वेष को उत्पन्न ही न होने देना। प्रतिक्रिया बनाम समझ: ध्यान के दौरान यदि कोई शारीरिक अनुभव (जैसे खुजली) हो, तो उस पर बिना समझे प्रतिक्रिया न करने की जिद पकड़ने के बजाय, उसके पीछे के कारण (वेदना, संज्ञा और वितर्क) को यथाभूत (जैसा है वैसा ही) जानना और समझना आवश्यक है। आस्रव क्षय ज्ञान (Asavakkhaya Nyan): जब साधक गहराई से यह समझ जाता है कि किसी भी धातु (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) या विज्ञान में कोई 'मैं' या 'मेरा' नहीं है, तो कामच्छंद और अविद्या का पूरी तरह नाश हो जाता है, जिससे अनागामी या अर्हत पद की प्राप्ति होती है।