Complete Adhyay 1 (Chapter 1) of Gita Bhaav Prasad in Hindi
Gita Bhaav Prasad
0:00 / 0:00
Complete Adhyay 1 (Chapter 1) of Gita Bhaav Prasad in Hindi
34 просмотра · 11 дн. назад
Gita Bhaav Prasad
6 подписчиков
34 просмотра · 11 дн. назад
Bhagwad Gita & Gita Bhaav Prasad (in form of hindi poem from Dr. Vimal Chandra Jain): Adhyay 1 / Chapter 1 in Hindi
Link for the book (Gita Bhaav Prasad): https://store.pothi.com/book/dr-vimal-chan...
अर्जुन विषाद योग।
अर्जुन आर्त ध्यान में जीता हुआ तद्विषयक प्रलाप करते हुए अपनी शोकग्रस्त व अवसादपूर्ण अभिव्यक्तियाँ श्लोक 46 तक 19 श्लोकों में दे रहा है।
आर्त चिंतन में आत्मग्लानि, शोक व अपनी ही आलोचना करता हुआ वह इन नकारात्मक विचारों से उत्पन्न पारिणामिक विषाद पूर्ण भावों से युक्त हो रहा है, जुड़ रहा है । उसका इन भावों से योग हो रहा है। अतः यह विषाद योग है।
अब इन श्लोकों व सम्पूर्ण अध्याय को निरन्तरता और तारतम्यता में पहले संस्कृत और फिर हिंदी पद्य भावानुवाद में सुनें। इस सतत श्रवण से भाव रसायन उत्पन्न होगा और हम कुछ अतिरिक्त अनुभूतियों को अनुभव कर सकेंगे।
महत्वपूर्ण यह है कि यह गहन अनुभूतियों का चिंतन हमें स्वयं के परिप्रेक्ष्य में करना है।हमें आत्मावलोकन करते हुए स्व मूल्यांकन करना है कि हमारा सांसारिक चिंतन भी क्या मोहग्रस्त अर्जुन की भांति ही है या उससे साम्य रखता है। आत्मसाक्षी से तुलना व समालोचन करें। यदि थोड़ी भी समानता है, जो कि निश्चित रूप से है ही सही क्योंकि हम भी कहीं न कहीं स्वजनों से मोहग्रस्त व रागात्मक होकर कहीं न कहीं, कभी न कभी तो विषादग्रस्त होते ही हैं, तो हम भी ऐसे ही आर्त चिंतन के कुछ आयामों को ही जी रहे हैं और हम भी विषाद योग से युक्त हैं।अपने भव रोग का आकलन व निदान ,पहचान हमें स्वयं ही करना है।
ध्यातव्य यह है कि विषादग्रस्त अर्जुन के लिए यदि भगवान के उपदेश एक शिष्य की तरह ज्ञेय और उपादेय हैं, तो वे हमारे लिए भी उतने ही उपयोगी हैं।
हम स्वयं को अर्जुन के स्थान पर रखकर अपने ही रोग का भी उपचार भी भगवान के उपदेशों को गम्भीरता से ग्रहण करके करें।
आज केवल अपने रोग की पहचान,अपने अंतर्मन का आकलन अर्थात भगवान के उपदेश ग्रहण करने हेतु अपनी चेतना को उसके लिए उर्वर बनाना।