हरि गुण लिखा न जाई | Sant Kabir Amritvani | Nirgun Bhajan | Hindi Devotional Song
MiYu Studio
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हरि गुण लिखा न जाई | Sant Kabir Amritvani | Nirgun Bhajan | Hindi Devotional Song
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हरि गुण लिखा न जाई — संत कबीर की वाणी पर आधारित यह अमृतवाणी भजन हमें यह सिखाती है कि हरि की महिमा को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
कितनी भी स्याही हो, कितने भी कागज़ हों — उनके गुण, करुणा, प्रेम और कृपा का वर्णन पूर्ण नहीं हो सकता।
यह भजन आत्मा को भीतर तक छूता है, मन को निर्मल करता है और हरि-नाम की साधना की ओर प्रेरित करता है। ✨
यदि आप Kabir Bhajan, Kabir Amritvani, Nirgun Bhajan, Hindi Devotional Songs सुनना पसंद करते हैं, तो यह भजन आपकी आत्मा को शांति से भर देगा।
🎧 FULL LYRICS – "हरि-गुण लिखा न जाई"
सात समंदर की मसि करौं, लेखनि सब बनाई।
धरती सब कागद कर लूं, हरि-गुण लिखा न जाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
जितना लिखूँ उतना कम पड़ै, मन हरि में डूबा जाई।
बोल न सकै ये जीव अधूरा, महिमा कौन बताई।
भाव हमारे मौन रह जाते, वाणी स्थीर न हों पाई।
अपरंपार हरि की महिमा, कहत-कहत भरमाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
पवन चले परछाईं डरै, अंबर रहै न ठाई।
ऐसे हरि के प्रेम को कोई, कैसे बात समझाई।
मन सूना मंदिर बन जावे, हरि नाम ज्यों समाई।
दुनिया तजकर दौड़ पड़े वो, प्रेम-लगन जो पाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
सोना-मोती राज-पाट सब, पल भर में मुरझाई।
जिस मन भीतर हरि विराजे, वह मन धन्य कहाई।
दिन में उजियारा भर देता, रात अँधेरा छाई।
हरि-बिन जीवन क्या जीवन, तृष्णा रहि गई राई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
माटी तन जल मन कहिये, दीपक सी लौ भाई।
जब तक जले हरि-नाम का दीपक, जीवन राह दिखाई।
बुझते ही सब सूना-सूना, भीतर ठंडी छाई।
नाम जप ले समय रहते, फिर अवसर न आई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
जहाँ-जहाँ नैनन जाएँ, हरि की छवि ही छाई।
फूल पड़े तो उनमें भी, हरि की सुगंध समाई।
दूर कहीं हरि होते नहीं, बात यही समझाई।
मन का द्वार खुला रख प्यारे, कृपा स्वयं घर आई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
रैन अँधेरी चाहे होवे, चाहे तूर न बजाई।
हरि-नाम जपे जो प्राणी, गति उसकी बन आई।
कष्टों से भी पार उतारे, दुःख की डोर छुड़ाई।
हरि-भक्त को कौन डुबाए, नौका हरि ने चलवाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
जग की जितनी रीति बनी, सब चलन यही बतलाई।
जो हरि को मन नहीं देताँ, जग में क्या कमाई।
धन-दौलत सब यहीं रहि जावे, देह भी हो झरझराई।
साथ वही आखिर चलेगा, हरि-नाम की रटाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
चंद्र, सूरज, तारा मिलकर, उजियारा बरसाई।
पर भीतर जो दीप जले, वो हरि-रस की छाई।
मन-मयूर नाचे तब भीतर, धुन हरि-नाम बजाई।
चातक जैसे प्यासी चितवन, हरि-बूँद को तरसाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
कहत कबीर सुनो रे सजना, देह भले पराई।
जीवन जल की बूंद समान, पल भर में सूख जाई।
हरि-गुण गा ले अब मनवा, माया झूठी भाई।
हरि ही सत्य, हरि ही शाश्वत, बाकी सब भरमाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
हरि-गुण लिखा न जाई।
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